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तेरे दर पर सनम चले आए हैं

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जबलपुर।राजनीति का अपना अलग मिजाज है , जिसमें पूर्वानुमान लगाना कठिन है व मिथक टूटते हुए नजर आते हैं । कुछ ऐसा ही वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में देखने को मिल रहा है। जिन नेताओं के कुछ वर्षों पूर्व भाव आसमान पर थे, अब वह ढेरी में बिकते नजर आ रहे हैं। सत्ता की मलाई चखने को लालायित यह नेता अब अपने अहम् को किनारे रख सत्तासीन दल में शामिल होने लाइन में खडे नजर आ रहे हैं। लगातार टूटती उम्मीदें और इन्हें इस मुकाम पर ले आई है जिसमें विरोधियों के दरवाजे पर अब पहरेदारी स्वीकार कर ली गई ।
उस दौर की याद आज भी ताजा हो जाती है जब सत्ता के नंबरों के फेर में वह नेता अचानक रातोंरात खबरों की सुर्खियां बनने लगा था । सत्तासीन पार्टी में लाने की ख्वाहिश उस जमाने में धरी की धरी रह गई थी, क्योंकि नेता ने स्वयं को पार्टी का वफादार साबित करने सभी मान मनौव्वल को ठुकरा दिया हालांकि इन नंबरों को उस पार्टी ने सफलता के साथ पार कर लिया और सत्ता का सिंहासन पा लिया, लेकिन पीछे छूट गया पश्चाताप जो ईश्वर प्रदत्त अवसर को ठुकरा देने का, उम्मीद थी की वफादारी का कुछ तो सिला मिलेगा, लेकिन हाथ आयी बेवफाई जिससे खफा नेता अवसर की तलाश में लग गया, जो उन्हें विधानसभा चुनाव 2018 में मिला। उम्मीद बाकी थी की विपरीत परिस्थिति के चलते विरोधी पार्टी एक बार फिर उनसे हाथ मिलाए और जैसे ही प्रतीक्षित अवसर मिला उन्होंने इस बार तनिक भी चूक नहीं की, और प्रदेश के मुखिया को पानी पी पी कर कोसने वाले यह नेता विरोधी पार्टी के रंगकर बेवफा पार्टी को आँखें दिखाने लगे। मुखिया के साथ इनकी तस्वीर अखबारों की आज सुर्खियां बनी लेकिन पीछे छूट कर रह गया एक सवाल की वर्तमान परिदृश्य में ढेरी में बिके उस नेता का नई पार्टी में मोल क्या होगा।

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