जहां चाह वहीं राह, गुड़ बनाकर 300 क्विंटल गन्ना बचाने की जुगत में लगे किसान

जहां चाह वहीं राह निकल आती है… गांव बहादरी के गन्ना उत्पादक चिमनसिंह नैन के खेतों में 300 क्विंटल गन्‍ने की फसल लॉकडाउन में खेतों में ही खड़ी रह गई। उन्होंने नुकसान की आशंका से हिम्मत नहीं हारी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर के मूलमंत्र से उन्हें दिशा भी मिल गई। उन्होंने 100 साल पुरानी गुड़ बनाने की पद्धति का उपयोग करने का निर्णय लिया। कुछ पुराने उपकरण उनके पास थे, कुछ अन्य किसानों से ले आए। उन्हें ठीक करवाया और और भट्टी जलाकर गन्‍ने से गुड़ बनाना शुरू कर दिया। अब तो लोग उनके पास गुड़ खरीदने पहुंचने भी लगे हैं।
चिमनसिंह अपने 50 बीघा खेत में हर साल लगभग 300 क्विंटल गन्ने की फसल लेते हैं। यह गन्ना मंदसौर और आसपास के चरखी वाले रस बेचने के लिए उनसे खरीद ले जाते थे। इस बार लॉकडाउन में शहरों और गांवों में चर्खियां भी बंद हैं। ऐसे में गन्ना बिका ही नहीं। मवेशियों को कुछ गन्‍ने की कुट्टी बनाकर भी खिला खिलाई, फिर भी गन्ना सूखने की चिंता उन्हें लगातार साल रही थी।

6-7 क्विंटल गुड़ बन रहा

चिमनसिंह ने बताया कि वे मूल रूप से उप्र के बागपत जिले के रहने वाले हैं। 100 साल पहले से पूर्वज चर्खी चलाकर गन्‍ने से गुड़ बनाते आए हैं। बस फिर क्या था, चरखी चलाने के लिए सामान की व्यवस्था की। पास में रखा पुराने सामान की मरम्मत करवाई और गुड़ बनाना शुरू कर दिया।

उन्हें गुड़ बनाने का काम शुरू किए 10-12 दिन हो गए। अभी एक भट्टी चालू की है और शाम से लेकर सुबह तक लगभग बिना केमिकल के उपयोग से प्रतिदिन 6-7 क्विंटल गुड़ बनने लगा है। हालांकि गन्न्ा 500 रुपए क्विंटल बिकता है और गुड़ फिलहाल 40 रुपए किलो बिक रहा है। एक क्विंटल गन्‍ने में 12-15 किलो गुड़ बन रहा है। गुड़ बनाकर बेचने में थोड़ा नुकसान जरूर है लेकिन फसल तो नष्ट होने से बच गई।

आसान नहीं फसल

गन्‍ने की फसल को पकने में एक साल लगता है। फरवरी में इसकी बोवनी होती है और फसल अगली फरवरी में तैयार होती है। नाजुक फसल होने से आठ बार इसकी गुड़ाई भी करना पड़ती है। फसल में पानी भी अन्य फसलों की तुलना में ज्यादा लगता है

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