Site icon Yashbharat.com

केंद्र ने SC से कहा- यह फुलटाइम जॉब नहीं, इसलिए MP-MLA की वकालत पर रोक गलत

mcms 15

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में शनिवार को इस मुद्दे पर बहस हुई कि विधायकों और सांसदों के कोर्ट में प्रैक्टिस यानी वकालत करने पर रोक लगाई जाए या नहीं। वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय ने याचिका दायर कर मांग की थी कि सांसदों या विधायकों की यह दोहरी भूमिका अवैध, अनैतिक और असंवैधानिक है।

सुप्रीम कोर्ट ने तमाम दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार का पक्ष पूछा, जिसका जवाब देते हुए एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि इस तरह का बैन नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि विधायकी या सांसदी फुल टाइम जॉब नहीं है। साथ ही ये भारत सरकार के कर्मचारी भी नहीं होते हैं।

इससे पहले अपनी बात पर जोर देने के लिए अश्विनी उपाध्याय ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम 49 का हवाला भी दिया। इसमें कहा गया है कि कोई भी पूर्णकालिक वेतनभोगी कर्मचारी, चाहे वह निगम, निजी फर्म या सरकार से जुड़ा हुआ हो, कानून की अदालत में वतौर वकील प्रैक्टिस नहीं कर सकता है।

कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी अन्य व्यवसाय में संलग्न नहीं हो सकता है और निश्चित रूप से वह वकील के रूप में अपनी सेवाओं की पेशकश नहीं कर सकता है। एम करुणानिधि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1979) में पांच न्यायाधीशीय बेंच ने स्पष्ट रूप से कहा कि सांसद और विधायक सरकारी कर्मचारी हैं। हालांकि, नियोक्ता-कर्मचारी संबंध उन पर लागू नहीं होंगे। बताते चलें कि करुणानिधि ने भ्रष्टाचार के मामले में तर्क दिया था कि वह सरकारी कर्मचारी नहीं थे।

वकील का काम पूर्णकालिक गतिविधि है और सांसदों व विधायकों का काम भी पूर्ण कालिक होता है। वे संसद और विधानसभा के पूर्णकालिक सदस्य होते हैं। उन्हें सदन की कार्यवाही में भाग लेना है, अपने निर्वाचन क्षेत्रों में लोगों से मिलना है और लोगों की समस्याओं को निपटना है। अपने काम को सुविधाजनक बनाने के लिए उन्हें एक बंगला, कार, कार्यालय और वेतन दिया जाता है। उन्हें लोगों की सेवा करनी चाहिए। हमें पार्ट-टाइम विधायकों की जरूरत नहीं है। हमें समर्पित संसद सदस्यों की जरूरत है।

इसके अलावा कोई भी वकील याचिकाकर्ता और प्रतिवादी दोनों से लाभ नहीं उठा सकता है। वकालत की प्रैक्टिस करने वाले सांसद और विधायक याचिकाकर्ता से फीस लेते हैं और प्रतिवादी से अपना वेतन प्राप्त करते हैं, जो केंद्रीय या राज्य सरकार है। यह पेशेवर दुर्व्यवहार है क्योंकि वे दोनों तरफ से लाभ उठाते हैं। यह हितों का टकराव भी है।

सांसदों और विधायकों के पास एक न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग शुरू करने की शक्ति है। इसका अर्थ यह है कि वे न्यायाधीश के खिलाफ एक अनुकूल फैसले देने के लिए दबाव डाल सकते हैं। लिहाजा, जब आप पब्लिक मनी लेते हैं और सरकार के खिलाफ बहस करते हैं, तो यह पेशेवर दुर्व्यवहार है।

Exit mobile version