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किसानों को जोखिम से बचाने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में हुआ ये संशोधन

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नई दिल्ली। खेती को जोखिम से बचाने वाली प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के कई प्रावधानों पर किसानों द्वारा सवाल उठाने के बाद उसमें व्यापक संशोधन किए गए हैं। निर्धारित अवधि के भीतर बीमा के दावों के भुगतान में देरी पर जुर्माने के साथ ब्याज भी देने का प्रावधान किया गया है। संशोधित फसल बीमा योजना के प्रावधानों को एक अक्तूबर, 2018 से लागू कर दिया गया है।

बीमा दावों पर विचार के लिए पंचायत और गांव के बजाय खेत को इकाई माना जाएगा। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के संशोधित प्रावधान में जोखिम का विस्तार कर दिया गया है। इसमें पहली बार बागवानी क्षेत्र की बारहमासी फसलों को भी प्रायोगिक तौर पर इसके दायरे में लाया गया है। इसके पहले तक केवल मौसम आधारित फसलें ही बीमा योजना में शामिल थीं।

दूसरे संशोधन के जरिये बीमा दावों की गणना के तरीके को और तर्कसंगत बना दिया गया है। इसमें बीते सात वर्षों में से सर्वश्रेष्ठ पांच वर्षों की उपज के आंकड़ों के आधार पर गणना का प्रावधान किया गया है।

गन्ना जैसी कम जोखिम वाली फसल के ऋणी किसानों को बीमा के दायरे से अलग कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश में भाजपा के सत्तारूढ़ होते ही इसे बीमा के दायरे से अलग कर दिया गया है, जिससे किसानों को लाभ हुआ है।

फसल बीमा दावों के भुगतान में देरी करने पर काबू पाने के उद्देश्य से सरकार ने कुछ सख्त कदम भी उठाए हैं, ताकि किसानों को समय से मुआवजा मिल सके। इस संशोधन में जुर्माना और प्रोत्साहन जैसे प्रावधान हैं। बीमा कंपनियों और बैंकों की सेवा में कमी, खामियों में जुर्माना का प्रावधान और उन के प्रदर्शन का मूल्यांकन और डी-पैनल के विस्तृत मानदंड बनाए गए हैं।

बीमा कंपनियों द्वारा दो माह से अधिक विलंब से दावों के भुगतान पर 12 फीसद की दर से वार्षिक ब्याज देना होगा। इसी तरह बीमा कंपनियों को राज्य सरकार ने प्रीमियम सब्सिडी निश्चित अवधि में नहीं दी तो 12 फीसद ब्याज के साथ देना होगा।

इन आपदाओं पर मिलेगा बीमा-

-स्थानीय आपदाओं में ओलावृष्टि, भूस्खलन और जलभराव के साथ बादल फटना और प्राकृतिक अग्निकांड को भी शामिल किया गया है।

-फसल कटाई के बाद खेत में पड़ी फसलों को बेमौसम वर्षा से नुकसान के अलावा अब इसमें ओलावृष्टि को भी शामिल कर लिया गया है।

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