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एमपी के दलित आंदोलन ने बिगाड़े सियासत के समीकरण

bharat bandh

भोपाल। मध्य प्रदेश के चुनावी साल में एमपी में हुए दलित आंदोलन ने सियासत के समीकरण बिगाड़ दिए हैं. एक तरफ जहां बीजेपी को दलितों के बीच वोट बैंक खिसकने का डर सता रहा है तो वहीं कांग्रेस आंदोलन के बहाने दलितों के बीच अपनी सियासी ज़मीन तलाश रही है.

दरअसल, 2 अप्रैल को ग्वालियर-चंबल में दलित आंदोलन के दौरान हुई हिंसा ने भोपाल के सियासी गलियारों में हलचल बढ़ा दी है. सत्तारुढ़ बीजेपी जहां इस आंदोलन में संभावित सियासी नुकसान के कंट्रोल में जुट गई है तो वहीं विपक्ष में बैठी कांग्रेस को बैठे बिठाए मुद्दा मिल गया है.

दोनों ही पार्टियों ने सियासी तौर पर दलित आंदोलन से निपटने के लिए रणनीति तैयार करने की कवायद शुरु कर दी है.
-BJP ने प्रदेश में करीब 2 हजार ऐसे गांव चिन्हित किए हैं जहां एससी-एसटी मतदाताओं की संख्या ज्यादा है


-इन गांव में पार्टी के जनप्रतिनिधि और पदाधिकारी न केवल दौरा करेंगे बल्कि दलितों के बीच रात भी बिताएंगे
-इस अभियान में मुख्यमंत्री, मंत्री से लेकर विधायक और सांसद तक शामिल होंगे
-ये अभियान 14 अप्रैल से शुरु होकर 5 अप्रैल तक चलेगा

एक तरफ जहां बीजेपी की कोशिश दलितों के बीच पहुंचकर डैमेज कंट्रोल करने की है तो वहीं कांग्रेस ने दलितों का दिल जीतने के लिए भी रणनीति तैयार की है

-कांग्रेस ने दलितों के लिए समरसता सम्मेलन करने का फैसला किया है
-ये सम्मेलन 14 अप्रैल को डॉ भीमराव अंबेडकर की जयंती से शुरु होंगे
-इन सम्मेलनों का आयोजन प्रदेश भर में संभाग और जिला स्तर तक किया जाएगा
-इनमें कांग्रेस के बड़े नेता और पदाधिकारी शामिल होंगे
-पार्टी ने 10 अप्रैल से प्रदेश भर में सहायता केंद्र खोलने का भी ऐलान किया है

ये सहायता केंद्र ऐसे लोगों की जानकारी इकट्ठा करेंगे जो अराजकता के लिए जिम्मेदार होंगे. कांग्रेस नेता उन मृतकों के परिजनों से मिलने भी जाएंगे जिनकी दलित आंदोलन की हिंसा के दौरान जान गई.
बात चाहें कांग्रेस की हो या बीजेपी की, सियासत के खेल में सबकी नज़रें वोट बैंक पर टिकी हैं. वोट बैंक की इस कवायद में आम जनता के हित कहीं पीछे छूटते नज़र आ रहे हैं.

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