नई दिल्ली । पिछले चार दशकों से गृहयुद्ध से जूझ रहे अफगानिस्तान से एक और महाशक्ति के बाहर निकलने की जमीन तैयार हो गई है। अफगानिस्तान में शांति स्थापना के लिए कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच समझौते के मसौदे पर हस्ताक्षर किए गए। जिसकी कारण वहां से अगले कुछ ही महीनों में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के सैनिकों की वापसी हो सकेगी लेकिन साथ ही वहां तालिबान के सत्ता में आने का रास्ता भी खुल जाएगा।
तालिबान व पाकिस्तान के पुराने और नजदीकी संबंधों को देखते हुए भारत के सुरक्षा और कूटनीति पर भी इस समझौते के व्यापक असर की संभावना जताई जा रही है। वैसे बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि तालिबान और अफगानिस्तान की मौजूदा अशरफ गनी सरकार और अन्य राजनीतिक दलों व दूसरे घटकों से बातचीत में किस तरह की सहमति बनती है। दोहा में अमेरिका के मुख्य वार्ताकार खलीलजाद और तालिबान के मध्यस्थ मुल्ला बरादर ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए।
इस मौके पर अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोंपियो, कतर में भारत के राजदूत पी. कुमारन, पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी समेत कई देशों के प्रतिनिधि भी उपस्थित थे। समझौते के अनुसार अगले 14 महीनों में अफगानिस्तान के विभिन्न इलाकों में तैनात 14 हजार अमेरिकी सैनिकों की वापसी होगी।
पहले चरण में 5,000 सैनिक घरवापसी करेंगे । इस बीच तालिबान और अफगान सरकार के बीच वार्ता का सिलसिला शुरू होगा ताकि वहां सत्ता भागीदारी को लेकर एक सर्वमान्य सहमति बन सके। इस दौरान अफगानिस्तान की मौजूदा अशरफ गनी सरकार को अमेरिका सैन्य सुरक्षा मुहैया कराता रहेगा। इस आश्वासन के बावजूद तालिबान की तरफ से अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार को लेकर स्पष्ट तौर पर अभी तक कुछ नहीं कहा गया है।

