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इंदौर के अस्पताल में बनेंगे दिमाग से कंट्रोल होने वाले कृत्रिम हाथ-पैर

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Hospital MRI Room Illustration

इंदौर। एमवाय अस्पताल में जल्द ही दिमाग से कंट्रोल होने वाले कृत्रिम हाथ-पैर तैयार किए जाएंगे। इस नई तकनीक से दिव्यांग सामान्य व्यक्तियों की तरह अपने हाथ-पैर चला सकेंगे। एमवायएच स्थित प्रदेश के एकमात्र कृत्रिम अंग आरोपण केंद्र को दिल्ली के सफदरगंज अस्पताल में बने केंद्र की तर्ज पर अपडेट किया जाएगा। इसके लिए एमजीएम मेडिकल कॉलेज ने तैयारी कर ली है। अस्पताल का निरीक्षण करने दिल्ली की टीम आएगी।

दिव्यांगों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए 1975 में प्रदेश के तीन मेडिकल कॉलेजों में कृत्रिम अंग आरोपण केंद्र बनाए गए थे। राज्य शासन ने इसे आर्टिफिशियल लिम मैन्युफैक्चरिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया की मदद से शुरू किया था। भोपाल और जबलपुर में बनाए केंद्र तो सालों पहले बंद हो गए। सिर्फ इंदौर का केंद्र ही काम कर रहा है।

अभी यहां केवल कृत्रिम अंग बनाकर दिए जाते हैं। अब इसे फिजिकल मेडिसिन एंड रिहेबिलिटेशन सेंटर के रूप में विकसित किया जाएगा। इसमें अंग बनाने के साथ ही दिव्यांगों की थैरेपी व काउंसलिंग भी की जाएगी। मेडिकल कॉलेज ने एक साल में इस पूरे सेटअप को तैयार करने की योजना बनाई है। हाल ही में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी सभी मेडिकल कॉलेजों में इसे बनाए जाने पर जोर दिया है।

फैक्ट फाइल

1975 – में एमवायएच में खोला गया केंद्र

60 – लोगों के हर माह बनाए जाते हैं कृत्रिम अंग

2017 – तक 53282 दिव्यांगों को दिए सहायक उपकरण

16455 – लोगों को बनाकर दिए कृत्रिम हाथ व पैर

01 – करोड़ रुपए लागत के बनाए कृत्रिम अंग

दिमाग से ऐसे करेंगे कंट्रोल

एमवायएच के केंद्र में मायो इलेक्ट्रिक हैंड उपलब्‍ध कराने के लिए भी प्रस्ताव तैयार किया गया है। इसकी मदद से दिव्यांग सेंसर का प्रयोग कर दिमाग से अपने हाथ-पैर को आदेश देकर ऑपरेट कर सकेंगे। वे सामान्य लोगों की तरह इनका मूवमेंट भी कर सकेंगे।

पूरे प्रदेश से आते हैं मरीज

कृत्रिम अंग आरोपण केंद्र में पूरे प्रदेश के सरकारी अस्पतालों से मरीज आते हैं। इसके अलावा सामाजिक न्यास विभाग के माध्यम से भी दिव्यांगों को सहायता के लिए भेजा जाता है। गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों को ये उपकरण निशुल्क दिए जाते हैं। वहीं अन्य दिव्यांगों को मात्र सात से आठ हजार रुपए में उपलब्ध कराए जाते हैं। बाजार में यही उपकरण 70 से 80 हजार रुपए में तैयार होते हैं।

सिर्फ इंदौर का केंद्र चालू

राज्य शासन ने 1975 में इंदौर, भोपाल और जबलपुर मेडिकल कॉलेजों में इसे शुरू किया था। 1997 में स्टाफ की कमी के कारण भोपाल का केंद्र बंद हो गया। जबलपुर में पर्याप्त स्टाफ न होने से नियमित काम नहीं हो रहा। एमवायएच के तलघर में बनाया गया यह केंद्र एक आर्थोटिकटेक्निशियन, एक शू मेकर, एक कारपेंटर, एक प्रोस्टेटिक टेक्निशियन व एक अकाउंटेंट की मदद से चल रहा है।

इनकी हो रही मदद

वे बच्चे जो जन्म से कमर में परेशानी व पैर टेढ़े या छोटे-बड़े होने से खड़े नहीं हो पाते उनके लिए कैलिपर बनाए जाते हैं। दुर्घटना में जो लोग हाथ-पैर गंवा देते हैं उनके लिए कृत्रिम अंग बनाए जाते हैं। वहीं लकवे के कारण शरीर का कोई अंग काम न करे या वे बुजुर्ग जो कमर दर्द के कारण खड़े नहीं हो पाते उन्हें भी कमर के पट्टे या सहायक उपकरण बनाकर दिए जाते हैं।

लैब को और बेहतर बनाएंगे

इस केंद्र को अपग्रेड कर दिल्ली के सफदरगंज अस्पताल में बने केंद्र की तरह तैयार किया जाएगा। मायो इलेक्ट्रिक हैंड भी सरकारी खर्च पर ही उपलब्ध कराएंगे। दिल्ली अस्पताल के अधीक्षक यहां का निरीक्षण करेंगे।

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