इंदौर। चार माह के लिए भगवान श्रीहरि विष्णु सोमवार को देवशयनी एकादशी पर शयन पर जाएंगे। इस दौरान शहर के कृष्ण मंदिर में शयन आरती होगी। इस दिन चातुर्मास की शुरुआत के साथ ही शादी-विवाह, नामकरण, मुंडन-गृह प्रवेश के साथ मांगलिक कार्यों पर विराम भी लगेगा। महाराष्ट्रीयन समाज द्वारा महाराष्ट्र के पंढरपुर की तर्ज पर दिंडी यात्रा निकाली जाएगी।
ज्योर्तिविद् ओम वशिष्ठ ने बताया कि देवशयन से चातुर्मास शुरू होने से मांगलिक कार्यों पर विराम लग गया है। अब मांगलिक कार्यों की शुरुआत 19 नवंबर को देवउठनी ग्यारस के साथ शुरू होगी। इस बार देवउठनी ग्यारस के बाद भी वैवाहिक आयोजन शुरू नहीं होंगे क्योंकि गुरु का तारा भी 12 नवंबर से 7 दिसंबर तक अस्त रहेगा। इसके बाद 16 दिसंबर से धनु का मलमास लगेगा।
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को हमारी परंपरा में देवशयनी एकादशी के तौर पर मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन से अगले चार महीनों तक भगवान श्री हरि विश्राम में रहेंगे। इन चार महीनों में सभी मांगलिक-सामाजिक आयोजन वर्जित रहेंगे।
हिन्दू धर्म में एकादशी को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष भर में कुल 24 एकादशियां आती है लेकिन जिस साल मलमास या अधिकमास आता है उस साल यह बढ़कर 26 हो जाती है। आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते है।
देवशयनी एकादशी के दिन से भगवान विष्णु का शयनकाल प्रारंभ हो जाता है इसी कारण इसे देवशयनी एकादशी कहा जाता है। देवशयनी एकादशी से लेकर अगले चार महीनों तक भगवान विष्णु शयनकाल में चले जाते है जो देवउठनी एकादशी पर समाप्त होता है। और देवउठनी एकादशी पर ही भगवान विष्णु पुन: जागते है। देवशयन एकादशी को पद्मा एकादशी, आषाढ़ी एकादशी और हरिशयनी एकादशी भी कहा जाता है।
देवशयनी एकादशी क्या है?
हरिशयनी एकादशी आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। आषाढ़ महीने की शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक महीने की शुक्ल एकादशी तक किसी भी तरह के शुभ कार्य जैसे यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह, दीक्षाग्रहण, ग्रहप्रवेश, गृह निर्माण यज्ञ आदि धर्म कर्म से जुड़े जितने भी शुभ कार्य होते हैं वर्जित हो जाते है। इस अवधि के दौरान कोई भी शुभ कार्य करना अच्छा नहीं माना जाता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार श्री हरि के शयन को योगनिद्रा भी कहा जाता है।
इस अवधि में विवाहादि सभी शुभ कार्य वर्जित हो जाते हैं। इन दिनों में तपस्वी एक स्थान पर रहकर ही तप करते है। धार्मिक यात्राओं में भी केवल ब्रज यात्रा की जा सकती है। ब्रज के विषय में यह मान्यता है, कि इन चार मासों में सभी देव एकत्रित होकर तीर्थ ब्रज में निवास करते है। बेवतीपुराण में भी इस एकादशी का वर्णन किया गया है। यह एकादशी उपवासक की सभी कामनाएं पूरी करती है।
देखा जाए तो इस परंपरा के पीछे पौराणिक के साथ-साथ व्यावहारिक चीजें भी जुड़ी हुई हैं। पारंपरिक रूप से कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में बारिश के ये चार महीने बहुत महत्त हुआ करते हैं, ऐसे में यदि इन्हीं दिनों किसी तरह के मांगलिक आयोजन होंगे तो मूल कर्म से ध्यान बंटेगा।
इसी तरह बारिश के महीनों में सामाजिक-सामूहिक आयोजन में कई तरह की व्यावहारिक दिक्कतें भी पेश आती हैं, इसीलिए इस समय को योजनाबद्ध आयोजनों के लिए वर्जित किया गया है।
पूजा विधि
देवशयनी एकादशी के दिन प्रात:काल जागकर घर की साफ़-सफाई कर लें। उसके बाद नित्य कर्म से निवृत होकर स्नानादि आदि करके घर को गंगा जल से पवित्र कर लें। अब पूजा स्थल पर भगवान श्री हरि की सोने, चांदी, तांबे या पीतल की मूर्ति स्थापित करें। इसके बाद षोडशोपचार सहित पूजा करें।
पूजन करने के लिए धान्य के ऊपर कुंभ रखें। कुंभ को लाल रंग के वस्त्र से बांधें। इसके बाद कुम्भ की पूजा करें। ये सभी क्रियाएं करने के बाद धूप, दीप और पुष्प से श्री हरि की पूजा करनी चाहिए। पूजा समाप्त करने के बाद व्रत कथा अवश्य पढ़े या सुने। उसके बाद आरती करें और प्रसाद बांटें। अंत में सफ़ेद चादर से ढंके गद्दे तकिये वाले पलंग पर श्री हरि विष्णु को शयन कराना चाहिए।
व्रत विधि
देवशयनी एकादशी व्रत को करने के लिये व्यक्ति को इस व्रत की तैयारी दशमी तिथि की रात्रि से ही करनी होती है। दशमी की रात्रि के भोजन में किसी भी प्रकार का तामसिक प्रवृ्ति का भोजन नहीं होना चाहिए। भोजन में नमक का प्रयोग करने से व्रत के शुभ फलों में कमी होती है। व्रती को भूमि पर शयन करना चाहिए।
जौ, मांस, गेहूं तथा मूंग की दान का सेवन करने से बचना चाहिए। यह व्रत दशमी तिथि से शुरू होकर द्वादशी तिथि के प्रात:काल तक चलता है। दशमी तिथि और एकाद्शी तिथि दोनों ही तिथियों में सत्य बोलना और दूसरों को दु:ख या अहित होने वाले शब्दों का प्रयोग करने से बचना चाहिए।
देवशयनी एकादशी से त्यागने वाली वस्तुएं :
1. भगवान विष्णु के शयनकाल में जाने के बाद अगले चार महीनों तक पलंग पर सोना, झूठ बोलना, मांस-मछली आदि का सेवन करना, दुसरे के द्वारा दिए दही-भात का सेवन, मूली और बैंगन आदि का सेवन त्याग देना चाहिए।
2. देवशयन के बाद चार महीनों तक तपस्वी भ्रमण नहीं करते और एक ही स्थान पर तप करते रहते है। इस दौरान केवल ब्रज की यात्रा की जा सकती है। क्योंकि चरमास के दौरान पृथ्वी के सभी तीर्थ ब्रज में आकर निवास करते है।
देवशयनी एकादशी व्रत कथा
देवशयनी एकादशी से संबंधित एक पौराणिक कथा प्रचलित है। सूर्यवंशी मांधाता नाम का एक राजा था। वह सत्यवादी, महान, प्रतापी और चक्रवर्ती था। वह अपनी प्रजा का पुत्र समान ध्यान रखता है। उसके राज्य में कभी भी अकाल नहीं पड़ा था। एक समय राजा के राज्य में अकाल पड गया।
प्रजा अन्ना की कमी के कारण अत्यन्त दु:खी रहने लगी। राज्य में यज्ञ होने बन्द हो गए। एक दिन प्रजा राजा के पास जाकर प्रार्थना करने लगी की हे राजन, समस्त विश्व की सृष्टि का मुख्य कारण वर्षा है। इसी वर्षा के अभाव से राज्य में अकाल पड गया है. और इस वजह से प्रजा अन्ना की कमी का सामना कर रही है।
यह देख दु;खी होते हुए राजा ने भगवान से प्रार्थना की हे भगवान, मुझे इस अकाल को समाप्त करने का कोई उपाय बताइए। यह प्रार्थना कर मान्धाता वन की और चल दिए। घूमते-घूमते वे ब्रह्मा के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचें। उस स्थान पर राजा रथ से उतरे और आश्रम में गए। वहां मुनि अभी प्रतिदिन की क्रियाओं से निवृ्त हुए थे।
राजा ने उनके सम्मुख प्रणाम किया। ऋषि ने उनको आशीर्वाद दिया, फिर राजा से बोले, कि हे महर्षि, मेरे राज्य में तीन वर्ष से वर्षा नहीं हो रही है। चारों और अकाल पडा हुआ है और प्रजा दु:ख भोग रही है। राजा के पापों के प्रभाव से ही प्रजा को कष्ट मिलता है। ऐसा शास्त्रों में लिखा है, जबकि मैं तो धर्म के सभी नियमों का पालन करता हूं।
इस पर ऋषि बोले की हे राजन, आषाढ मास के शुक्ल पक्ष की पद्मा नाम की एकादशी का विधि-पूर्वक व्रत करो। एक व्रत के प्रभाव से तुम्हारे राज्य में वर्षा होगी. और प्रजा सुख प्राप्त करेगी। राजा ने राज्य में लौटकर यही किया। व्रत के पुण्य-प्रताप से राज्य में पर्याप्त वर्सा हुई और मांधाता का राज्य धन धान्य से पूर्ण हुआ।
मुनि की बात सुनकर राजा अपने नगर में वापस आया और उसने एकादशी का व्रत किया. इस व्रत के प्रभाव से राज्य में वर्षा हुई और मनुष्यों को सुख प्राप्त हुआ. देवशयनी एकाद्शी व्रत को करने से भगवान श्री विष्णु प्रसन्न होते है. अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले व्यक्तियों को इस एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए।
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