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असरदार प्रचार के लिए उम्मीदवारों ने अपनाया ये फॉर्मूला, दुकानदारों की चांदी

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जबलपुर। नामांकन के बाद प्रत्याशियों के खर्च की उल्टी गिनती शुरू गई है। चुनाव आयोग की नजर हर वक्त प्रत्याशी पर बनी हुई है। प्रचार के हर तरीके को खर्च से जोड़ा जा रहा है। इसलिए प्रत्याशियों ने सीमित खर्च में ज्यादा प्रचार का नया फार्मूला निकाला है।

झंडे-बैनर की जगह इस बार पूरा काम टोपी और मफलर से हो रहा है। आयोग ने प्रत्याशियों के प्रचार से जुड़ी हर गतिविधि के लिए रेट तय कर रखे हैं। आमतौर पर पार्टियां और प्रत्याशी झंड़े-बैनर, पोस्टर के जरिए अपना प्रचार करती हैं। ये तरीका एक तरह से चुनाव चिन्ह को बताने का होता है। लेकिन इस बार प्रत्याशी समर्थकों को टोपी, मफलर और बैंड पहना रहे हैं। सूत्रों की मानें तो प्रत्याशी को इसमें खर्च कम आता है और प्रचार अधिक होता है। डिमांड बढ़ने से चुनाव प्रचार सामग्री बेचने वाले भी झंडे बैनर से ज्यादा टोपी और मफलर अधिक मंगवा रहे हैं।

चाय से लेकर कुर्सी तक के रेट तय

प्रत्याशी के लिए 28 लाख रुपए कुल खर्च तय होता है। इसमें उनके और समर्थकों के चाय-नाश्ता से लेकर मंच, झंडे, बैनर, गाड़ी, कुर्सी-टेबल, माइक, पेट्रोल हर चीज का अलग-अलग रेट चार्ट आयोग ने बना रखा है। जिसके हिसाब से खर्च का आकलन होता है। एक चाय का 5 रुपए खर्च जुड़ता है। यही वजह है कि प्रचार के वक्त प्रत्याशी चाय-नाश्ते से परहेज करते हैं, क्योंकि प्रचार के वक्त किसी समर्थक या मतदाता ने भी चाय-नाश्ते का ऑफर किया तो वो भी प्रत्याशी के खर्च में जुड़ जाएगा। सभा में लगने वाली कुर्सी का 9 रुपए प्रति कुर्सी कवर के साथ खर्च जोड़ा जाता है।

कम खर्च में ज्यादा प्रचार

प्रत्याशियों को टोपी, मफलर, बैंड से दूसरे तरीकों से ज्यादा असरदार लग रहा है। प्रचार सामग्री विक्रेता की मानें तो प्रत्याशी को ये सस्ते पड़ते हैं। टोपी और मफलर का उपयोग कितने समर्थक कर रहे हैं, इसे कम संख्या दिखा देते हैं। इसके अलावा इस सामग्री को समर्थक गली-मोहल्ले में पहनकर घूमते हैं जिससे ज्यादा प्रचार होता है। वहीं झंडे-बैनर एक जगह लग जाते हैं, जिससे प्रचार सीमित क्षेत्र में हो पाता है।

हिसाब-किताब के लिए सीए तैनात

आयोग के लिमिट से ज्यादा खर्च न हो इसके लिए हर प्रत्याशी अपना अकाउंट बराबर मेंटेन कर रहे हैं। चार्टर्ड अकाउंटेंट हर दिन खर्च का ब्यौरा तैयार कर रहे हैं। प्रचार लंबा चलना है, इसलिए हर दिन के संभावित खर्च की सीमा पहले ही तैयार कर ली गई है। उसी के हिसाब से रकम कम-ज्यादा होती है।

आयोग के लिमिट से ज्यादा खर्च न हो इसके लिए हर प्रत्याशी अपना अकाउंट बराबर मेंटेन कर रहे हैं। चार्टर्ड अकाउंटेंट हर दिन खर्च का ब्यौरा तैयार कर रहे हैं। प्रचार लंबा चलना है, इसलिए हर दिन के संभावित खर्च की सीमा पहले ही तैयार कर ली गई है। उसी के हिसाब से रकम कम-ज्यादा होती है।

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