जबलपुर,नगर प्रतिनिधि। पूर्व विधानसभा क्षेत्र में राजनीतिक सरगर्मियां पूरे शबाब पर है, यहां कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला है गौरतलब है कि इस क्षेत्र की सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है । क्षेत्र पिछड़ा होने के चलते गरीबी अशिक्षा और बेरोजगारी के साथ ही मूलभूत सुविधाओं से यहां के रहवासी आज भी परेशान है। राजनीतिक वादे इस चुनाव में भी खूब किए जाएंगे लेकिन प्रत्याशी के जीतने के बाद वे जमीनी स्तर पर हवा हो जाते हैं। क्या करोगे भाई यहां पर विकास की बातों से किसी का कोई सरोकार तक नहीं है । यहां चलता है तो सिर्फ एक ही शब्द भैया। बात करें अगर अशिक्षित युवाओं की तो वह इसी प्रकार के भैयावाद के महिमामंडन में घिरे हुए हैं । भाई पढ़ाई तो की नहीं तो अब भैया की पूंछ पकड़कर भवसागर पार करने की उम्मीद लगाए हुए हैं। दारू के ठेके, साइकिल स्टैंड का ठेका अब तो बस इसी की आस है, जो आज नहीं तो कल भैया तो दिलवाएंगे और कल जब जुआ फड़ में जुआ खिलवाते, अवैध शराब शराब बनाते हुए और सट्टा की पर्ची काटते हुए अगर पकड़े गए भैया ही एक मात्र सहारा होंगे जो आएंगे और पुलिस को धौंस दिखाकर हमें छुड़ाएंगे, और क्या चाहिए भैया से।
पिछले चुनाव पर एक नजर
जबलपुर पूर्व विधानसभा सीट मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले की एक सीट है. ये जबलपुर लोकसभा सीट का हिस्सा है, जो महाकोशल इलाके में पड़ता है।
इस विधानसभा सीट में वोटरों की कुल संख्या 209640 है.
2013 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर अंचल सोनकर (बीजेपी) ने 67167 वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी. उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी को मतों के अंतर से हराया. दूसरा स्थान (66012) वोटों के साथ एडवोकेट लखन घंघोरिया (कांग्रेस) को मिला. तीसरा स्थान (4263) वोटों के साथ श्रीमती शिवरानी बिरहा (बीएसपी) का रहा. (2761) वोटों के साथ नोटा को चौथा स्थान को मिला. चुनाव में कुल 142704 मत पड़े थे. कुल 68.07प्रश मतदान हुआ।
वर्तमान विधायक के स्वास्थ्य पर उठ रहे सवाल
वर्तमान विधायक के स्वास्थ्य पर सवाल खड़े हो रहे थे जिसको लेकर क्षेत्र के वरिष्ठ नेता भोपाल की दौड़ भी लगा चुके हैं और आलाकमान के सामने विधायक की सेहत पर भी बात की। वहीं नेताजी के समर्थक इस बात को दरकिनार करते हैं उनका कहना है कि यह विरोधियों द्वारा फैलाई जा रही अफवाह है । वरना आज भी नेता जी की सक्रियता में कोई कमी नहीं है। हालांकि यह भी सच है की स्वास्थ्य तो खराब है लेकिन सत्ता का सुख छूटे नहीं छूटता है।
भैया हमेशा मदद को तैयार
विधायक है तो विरोध तो होगा ,परंतु ऐसा नहीं है कि इतने बड़े लोकतंत्र से मिले मतदान झूठे भी साबित हों , क्योंकि कार्यकर्ताओं पर मुसीबत आने पर भैया खड़े दिखाई देते हैं यही कारण है युवाओं का विश्वास वर्तमान विधायक अंचल सोनकर पर बना हुआ है।
जीत हार का अंतर होता है कम
विधानसभा चुनाव-2013
भाजपा-अंचल सोनकर-67167
कांग्रेस-लखन घनघोरिया-66012
विधानसभा चुनाव -2008
कांग्रेस-लखन घनघोरिया-51934
भाजपा-अंचल सोनकर-45232
जबलपुर पूर्व विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी के विधायक अंचल सोनकर ने कांग्रेस के लखन घनघोरिया को 1700 से अधिक मतों से हराकर यह सीट कांग्रेस से छीन ली थी। वही लखन घनघोरिया ने 2008 में जब चुनाव जीता था तब वोटों का अंतर 6000 था , वहीं लक्ष्मी बेन जब चुनाव हारे तब वोटों का अंतर मात्र 1200 था।
वहीं कांग्रेस में एक तरफ यह हल्ला था कि पूर्व विधानसभा से लखन घनघोरिया की टिकट पक्की है परंतु पार्टी तो पार्टी है सभी विधानसभाओं की टिकट घोषित हो चुकी थी फिर सभी के मन में संशय पैदा कर दिया कि हो सकता है लखन घनघोरिया उत्तर मध्य से चुनाव लड़े । परंतु दिवाली के दिन संगठन द्वारा लखन घनघोरिया को टिकट रूपी गिफ्ट दे दिया गया जिसके उपरांत यह बात साफ हो गई और लखन घनघोरिया पूर्व विधानसभा में कांग्रेस के प्रत्याशी बने , परंतु मन में सभी के यही सवाल बना था कि आखिर इतनी लेट लतीफी संगठन द्वारा पूर्व विधानसभा में टिकट को लेकर क्यों की गई
सरल और व्यावहारिक छवि ने फिर से बनाया प्रत्याशी
लखन घनघोरिया शहर में युवा कार्यकर्ता के मध्य में अच्छी खासी छवि रखते हैं युवाओं के लिए लखन घनघोरिया हमेशा खड़े नजर आते हैं । मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में उनकी अच्छी खासी पकड़ हैं । उनका यही सरल एवं सहज स्वभाव उन्हें पूर्व क्षेत्र में पहली बार प्रत्याशी बनते ही जताने में कामयाब हुआ था, इसके चलते भाजपा ने 25 साल बाद पूर्व क्षेत्र में अपनी सीट गवांई थी।
गुटबाजी समाप्त अंदर से भीतरघात
सरल सहज व्यवहार जहां लखन घनघोरिया की विशेषताओं में है वहीं कुछ विरोधियों द्वारा गुटबाजी के चलते मन ही मन हार का डर सता रहा है । कुछ प्रत्याशियों ने विरोध करना तो बंद कर दिया है परंतु अंदर ही अंदर भीतर घात में लगे हुए हैं
जातियों पर आधारित गणित
,विधान सभा में जातीय समीकरण की बात जरूर आती तो और अच्छा होता । जातीय समीकरण मेें पूर्व क्षेत्र मे बेन,समाज के 17000 बोट है जबकि सोनकर,खटीक,समाज के मात्र 6,से 7। पर पाटी हमेशा इन्हीं समाज को टिकट देती है इस कारण दूसरा वर्ग को कभी मोका नही मिला ।
(1) चोधरी, 16000से 17000
(2) बेन,बंसकार,बसोर,बंसोड,धानक,धनकार,ये सभी जाती बैन ही है पूर्व क्षेत्र मे 17000 जिला मै 40000
(3) डुमार,सुदर्शन, बालमिक,यह 13000से 14000
(4)कुम्हार 4000से 5000
(5) कुचबंधिया,1500,
(6)महार,2000 से 3000
(7) जाट,कंजर,2000 के लगभग
(8)पासी,500,से 700
(9)कोरी ,3000से 4000
ऐसी अनुसूचित जाती को कभी भी राजनीतिक लाभ नही मिला और पूर्व क्षेत्र मे जब सोनकर खटीक के अगेंश(विरोध)मेें दूसरी जाति को टिकट मिलती है तो वह चुनाव जीतता है।
जैसे माया सालवार जीती, मंगल पराग जीते, लक्ष्मी बेन मात्र 1200 के लगभग हारे ,वह भी शिवराज लहर में।
पार्षद के चुनाव में विधायक पुत्र से प्रदीप बेन जीते थे, यहाँ सोनकर,खटीक विरोधी माहौल रहता है,सबसे बड़ी बात एससीएसटी के साथ सामान्य वर्ग भी क्षेत्र में सोनकर समाज को छोड़कर दूसरी जाति का सपोट करते है यह क्षेत्र का समीकरण है यहाँ जो भी पार्टी सोनकर,खटीक के विरोध में प्रत्याशी देगा उसके जीतने की ज्यादा उम्मीद होती है। वहीं इसका सीधा लाभ कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी को मिल जाता है।
क्या है समस्याएं
क्षेत्र को भले ही भाजपा का गढ़ कहा जाता रहा है परंतु क्षेत्र आज भी मूलभूत सुविधाओं से महरूम हैं जैसे पानी बिजली सड़क शिक्षा आदि।
क्षेत्र सबसे बड़ी समस्या है अपराध । 70त्न युवा क्षेत्र के अशिक्षित और बेरोजगार हैं जो कि कहीं ना कहीं अवैध कामों में लिप्त रहते हैं जिसके चलते इन अवैध काम को जारी रखने के लिए उन्हें राजनीतिक संरक्षण की जरूरत होती है और जिसका उपयोग इन नेताओं द्वारा किया जाता है । क्षेत्र के कुछ समाज के नेताओं का कहना है कि एक जाति विशेष को बस आगे बढ़ाया गया है बाकी बहुत सी जातियां आजादी के बाद आज भी उसी हालात में जहां पर वह पहले थी
क्या कह रहा है राजनीतिक गणित
परिसीमन के बाद स्थितियां पूरी तरीके से बदल चुकी हैं और हार जीत का फासला मुस्लिम मतदाताओं के हाथ में है । मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में कांग्रेस प्रत्याशी की अच्छी खासी पकड़ है वहीं भाजपा ने भी कुछ मुसलमानों को ध्यान में रखते हुए उन्हें पार्टी के विभिन्न पदों पर जगह दी हैं परंतु कुछ जगहों पर लोग अपने निजी स्वार्थ के चलते इन पार्टियों से जुड़े हुए हैं । पूर्व विधानसभा को लेकर राजनीतिक गणित कहता है घुमा फिरा कर यह दो ही प्रत्याशी मैदान में आते हैं और बाकी महज खानापूर्ति है पूर्व विधानसभा का चुनाव हमेशा की तरह इस बार भी रोचक रहेगा और दोनों पार्टियों द्वारा अपनी पूरी ताकत लगाई जा रही है हालांकि परिणाम को लेकर कोई भी व्यक्ति खुलकर कुछ भी नहीं कह पा रहा है परंतु देखना रोचक होगा कि जनता एक दबंग विधायक को अपने क्षेत्र में चाहे हगी , या फिर एक मिलनसार और सहज स्वभाव को अपने दिलों में जगह देगी।
भैया यह पूर्व क्षेत्र का चुनाव है

