पहले से ही बेबाक हैं न्यायमूर्ति चेलमेश्वर

नेशनल डेस्क। न्यायमूर्ति चेलमेश्वर पहले भी कई मुद्दों पर अपनी अलग राय व्यक्त करते रहे हैं। अप्रैल 2017 को एमएन राय मेमोरियल व्याख्यान के दौरान उन्होंने राष्ट्रवाद और राष्ट्रद्रोह के मुद्दे पर बोलते हुए कहा था कि उनकी राय में किसी भी समाज में चल रही न्यायिक व्यवस्था के कार्यान्वयन के ऊपर यह निर्भर नहीं करता है। इसका एक अन्य कारण अधिकारों के ऊपर लगाए जाने वाले प्रतिबंध हैं, जिसे नागरिक समाज का बनना कहा जाता है। उन्होंने कहा था कि राज्य कानून बनाता है, जो संवैधानिक बाध्यताओं के साथ ताॢकक या अताॢकक होता है या नहीं हो सकता है, जो एक अलग प्रश्न है।

दूसरा मुद्दा यह है कि जब कानून बनाया जाता है, तो इसे लागू कैसे किया जाता है। एक बेहतरीन कानून को भी गलत बताया जा सकता है। इसमें संभावनाएं सभी तरह की हो सकती हैं। किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए समस्या की जड़ पूरी घटना के बारे में नागरिक समाज की समझ है। मानवेंद्र नाथ राय और उनके विचार यानी पुनर्जागरण पर बात करते हुए उन्होंने कहा था कि उनकी राय में  हमारा समाज प्रोग्रेसिव है। उन्होंने कहा था कि हम जिन मुद्दों पर बात कर रहे हैं उनका संबंध इसी विचार से है और मैं उम्मीद करता हूं कि ऐसा कहते हुए मेरी हत्या नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा था कि आज शहरी भारत और ग्रामीण भारत के बीच एक खाई पैदा हो गई है।

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आज शहरों में जिन अधिकारों की बात करते हैं, उसके बारे में देश के 70 प्रतिशत आबादी को कोई मतलब नहीं होता और न हीं उसके बारे में वे ध्यान हीं देते हैं। उन्होंने कहा कि इसके उदाहरण के लिए हम एक दो साल पहले का एक उदाहरण ले सकते हैं, जिसमें एक लोकप्रिय नेता के ऊपर भ्रष्टाचार का आरोप लगा  और उनकी सदस्यता खत्म हो गई। वहां उप चुनाव हुए और उस नेता के प्रत्याशी को लोगों ने बहुमत दिया। हालांकि, हमलोग इसके लिए संघर्ष नहीं कर सकते हैं लेकिन यह इस व्यवस्था के ऊपर एक सवाल जरूर खड़ा करता है। इसके साथ हीं उन्होंने इस व्याख्यान में कहा कि जाति व्यवस्था भारतीय समाज की एक सच्चाई है लेकिन कुछ समय से जातीय संगठनों के लिए सरकारें अलग से प्रावधान कर रही है। यह भी समस्या नहीं है लेकिन जब यही मांग दूसरी जातियां ऊभी करना शुरू कर देती है, तो समस्या पैदा होना शुरू हो जाता है। इसी मांग से शुरू हो जाती है उन्हें दबाने की कोशिशें और उनके बोलने के अधिकारों से लेकर प्रदर्शन संबंधी अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए जाने लगते हैं। यही असहिष्णुता को पैदा करता है और आरोप प्रत्यारोप शुरू होता है। उन्होंने कहा कि इसके लिए लोगों के बीच एक सही शिक्षा और जागरुकता की आवश्यकता है, जो उन्हें सही और गलत के बीच के फर्क को बता सके।

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