किताबें लिखने के लिए रास आ गई जेल, मालेगांव ब्लास्ट का आरोपी नहीं ले रहा जमानत

मुंबई। जेल का नाम सुनते ही किसी का भी दिल बैठ जाता है। मगर मालेगांव ब्लास्ट मामले में जेल में बंद एक आरोपी जमानत लेने को तैयार नहीं है, क्योंकि वो जेल में रहते हुए ही प्राचीन हथियारों पर शोध करने के काम को जारी रखना चाहता है।

50 वर्षीय राकेश धावड़े 2008 में 29 सितंबर को नासिक के मालेगांव हुए विस्फोट मामले के आरोपी हैं। गिरफ्तार होने के बाद से ही वह जेल में हैं। इसी मामले में आरोपी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और लेफ्टीनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित सहित कई को जमानत मिल चुकी है। लेकिन धावड़े जमानत लेने के लिए तैयार नहीं हैं।

अब तक वह 25000 से ज्यादा पृष्ठ लिख चुके हैं। इस शोध के अलावा अलग-अलग विषयों पर उन्होंने करीब 15 पुस्तकें लिखी हैं। फिलहाल वह प्राचीन तोपों पर शोध कर रहे हैं। राकेश धावड़े का मामला अनोखा है। लोग जल्दी से जल्दी जेल से आजाद होना चाहते हैं, लेकिन उन्होंने वहां के माहौल को लेखन के लिए मुफीद माना है।

जमानत के लिए परिजनों के आग्रह पर उन्होंने तर्क दिया कि जो काम वह कर रहे हैं, उसके लिए जेल जैसी शांति उन्हें बाहर नहीं मिल पाएगी। पेशे से वकील उनकी छोटी बहन नीता धावड़े ने बताया कि स्वभाव से गंभीर प्रकृति के राकेश की प्राचीन हथियारों में अभिरुचि वंशानुगत है।

उनके पूर्वज छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना में हथियार बनाते थे। शिवाजी की तरफ से उन्हें धावडे़-सरपाटि की उपाधि मिली थी। राकेश जब कक्षा पांच में थे, तो उन्होंने एक तलवार की प्रतिकृति बनाकर अपने शिक्षक को दिखाई थी।

उनके चाचा और मां ने प्राचीन हथियारों में उनकी रुचि बढ़ाने में भूमिका निभाई। शिक्षा पूरी करने के बाद राकेश ने पुणे के राजा केलकर दिनकर म्यूजियम में नौकरी भी की।

कुछ वर्ष बाद ही वहां से अलग होकर उन्होंने ‘इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑफ ओरियंटल आम्र्स एंड आर्मरी’ नामक संस्था बना ली। यह संस्था जगह-जगह बच्चों के लिए प्राचीन हथियारों की प्रदर्शनी लगाती थी।

राकेश की सलाह पर ही 2005 में बनी फिल्म ‘मंगल पांडे: द राइजिंग’ में प्राचीन हथियारों का प्रयोग किया गया था। उन्हें वर्ष 2000 में इंग्लैंड के एक संग्रहालय के निमंत्रण पर दो बार न सिर्फ वहां जाने का मौका मिला, बल्कि वह रॉयल आम्र्स एंड आर्मर सोसायटी के सदस्य बने।

सदस्य बनने वाले वह पहले भारतीय हैं। नीता ने बताया कि जेल में रहकर पुस्तकें प्रकाशित कराने के लिए भी राकेश को लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। विशेष जज एसडी टेकाले ने न सिर्फ उन्हें पुस्तकें प्रकाशित कराने की अनुमति दी, बल्कि उनके शोधकार्य की प्रशंसा भी की।

आर्थिक तंगी के कारण अभी तक उनकी कोई पुस्तक प्रकाशित नहीं हो सकी है, लेकिन इन पुस्तकों के प्रकाशन के लिए अभी कोशिश जारी है और उम्मीद है कि इसमें कामयाबी भी मिल जाएगी।

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