इस जीत के हैं कई मायने

जबलपुर, अजय पांडे। २२ साल की सरकार के बाद एक बार फिर सत्ता की तरफ बढ़ रही भाजपा की जीत के मायेने क्या है? इसे मोदी की जीत कहीं जाये या विकास की या फिर जातिवाद की हार करार दिया जाये। नोट बंदी और जीएसटी के असर को भी इस चुनाव से जोड़ा गया और जनता के रूख को भापने के लिए गुजरात के परिणामों को आधार भी बनाया गया।

जबकि परिणाम सामने है तो फिर इसे क्या माना जाये। नोटबंदी को जनता ने स्वीकार कर लिया है और जीएसटी पर जो माहौल बनाने की कोशिश हो रही थी। वह भी नाकाम रही।

आज के दौर में राज्यों के चुनाव खबरियां चैनलों के द्वारा एक इवेंट के तरह दिखाया जाता है। जो लोकतंत्र के उत्सव में मनोरंजन का पुठ जोड़कर बाजार को भुनाने की कोशिश करते है और फिर हर चुनावों को पार्टी की असमिता और देश की नितियों का टर्निंग प्वाइंट बताकर महौल बना देते है।
भाजपा की तरफ से देखे तो उसे भरोसा था कि जनता उसके साथ है चाहे कोई कुछ भी कहे नहीं तो सत्ता के लिए समझौता वादी हो चुकी भाजपा गुजरात के तीन लड़को को खुला नहीं छोड़ती।

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कांग्रेस को लगता था कि वह जातिगत समीकरणों को साधकर गुजरात साध लेगी जबकि भाजपा खुद चाह रही थी कि चुनाव विकास पर न लड़ा जाये। क्योंकि २२ सालों की सरकार के बाद विकास पर चुनाव लड़ना एंटी इंकमवेंसी को खुद ही अंामत्रित करना होगा।

एक बार पटरी से विकास की गाड़ी उतरने के बाद भाजपा ने फिर विकास को पटरी पर नहीं आने दिया इसका परिणाम सामने आ रहा है। इसमें दो राय नही कि चुनावों में राहुल गांधी ने भरपूर मेहनत की लेकिन यह टू लिटल-टू लेट स्टेप था भाजपा कांग्रेस की जमीन हड़पती रही और राहुल दिल्ली में बैठे रहे। यदि यहीं ताकत पहले दिखाई होती तो विधायक पाला नहीं बदलते सरदार की कमजोरी का असर सेना पर पड़ा। फिर यहीं आसुरक्षा की भावना कांग्रेस में घर कर गई।

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जिसने क्षेत्रीय गठबंधनों की राह खोल दी। राहुल के साथ समस्या यह है कि उनके तेवर मौसम की तरह बदलते है अब ये टू लिटिल-टू लेट वाला तेवर देखते है कब तक बना रहता है।
यदि प्रधानमंत्री की बात करे तो वे हमेशा चुनावी मूड में रहते है माहौल बनाने की उनमे एक अद्भुत कला है परन्तु यह देश माहौल के भरोसे कितने दिन चलेगा। वे कब तक अपने नाम पर भाजपा को घसीटेगें।
एको अहं द्वितीयों नास्त् िका सिद्घांत कब तक चलता रहेगा इस पर भाजपा को चिन्तन करना पड़ेगा। आखरी बात यह कि जनता ने कठोर आर्थिक सुधारों पर सहमति तो दे दी है लेकिन उसके एक्ज़ीक्यूशन की बड़ी जिम्मेदारी अब शो मैन मोदी पर है, जिन्हें अब मंच से उतरकर मैदान में काम करना पड़ेगा।

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