बड़ी खबर-सवर्ण गरीबों को आरक्षणः HC ने कहा- संभावना तलाशें सरकार

नई दिल्लीः मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण जाति के लोगों को भी शिक्षा और रोजगार में आरक्षण दिए जाने की जरुरत है।

 

कोर्ट ने सरकार को इस संबंध में संभावना को तलाशने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने 14 छात्रों की एक याचिका पर यह निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि गरीब तो गरीब होता है। फिर चाहे वह अगड़ी जाति का हो या उसका संबंध पिछड़ी जाति से हो।

 

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि, ‘अगड़ी जाति में गरीबों को अब तक नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने कहा, कोई उनके हक में इस डर के चलते आवाज नहीं उठाता है, क्योंकि ऐसा करने पर सामाजिक न्याय के नाम पर उनको विरोध होने लगेगा।

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कोर्ट इस बात से भलीभांति है कि सभी समुदायों में गरीब लोग हैं और शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक नजरिए से उन्हें विकसित करने के लिए उनका प्रोत्साहन जरूरी है।’ जस्टिस किरुबाकरन ने आगे कहा कि, ‘गरीब, गरीब होता है। फिर चाहे वह अगड़ी जाति से हो या फिर पिछड़ी जाति से। ऐसे गरीबों की मदद की सिर्फ आर्थिक रूप से ही मदद नहीं करनी चाहिए। इनको शिक्षा और रोजगार में आरक्षण दिया जाना चाहिए।’

 

छात्रों ने याचिका में यह निर्देश देने की मांग की थी कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में ओपन कैटेगरी के लिए रखी गईं एमबीबीएस सीटें बीसी और एमबीसी कैटेगरी को ट्रांसफर करना अवैध, मनमानी और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करना है।

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इस दौरान जज ने सरकार के जवाबी शपथपत्र पर कहा कि, ’22 सरकारी कॉलेजों में 2,651 एमबीबीएस सीटें थीं। ओपन कैटेगरी की कुल 822 सीटों में सामान्य वर्ग के अतिरिक्त आरक्षित वर्ग के विद्यार्थी भी मेरिट लिस्ट के हिसाब से दावेदार होते हैं। ऐसे में सामान्य वर्ग के छात्रों को मिलने वाली संख्या 7.31 पर्सेंट घटकर 194 सीटों तक ही रह जाती है।’

 

जज ने कहा कि इससे स्पष्ट हो जाता है कि जातियों का वर्गीकरण बीसी, एमबीसी, एससी और एसटी के तौर पर हुआ है। केवल कुछ वर्ग ही अगड़ी जाति के तौर पर दर्शाए गए हैं लेकिन अधिकांश जातियों को बीसी या एमबीसी में वर्गीकृत कर दिया जाएगा तो सामाजिक और आर्थिक स्तर के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए दिए जाने वाले आरक्षण का कोई मकसद नहीं रह जाता है।

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