संविलियन के लिए तैयार नहीं बैंक, खतरे में सैकड़ों कर्मचारियों का भविष्य

भोपाल। जिला सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंकों के ज्यादातर अधिकारियों-कर्मचारियों की सेवाएं (संविलियन पर) लेने के लिए दूसरे सहकारी बैंक तैयार नहीं हैं। इससे सैंकड़ों कर्मचारियों का भविष्य खतरे में पड़ गया है। इनमें से 50 फीसदी को तो कुछ महीनों से वेतन भी नहीं मिल रहा है।

कुछ जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों ने आर्थिक स्थिति तो कुछ ने पद न होने का हवाला देकर संविलियन करने से मना कर दिया है। अभी तक 1164 कर्मचारियों में से मात्र 446 का ही संविलियन हो पाया है। उधर, संविलियन योजना की मियाद भी खत्म हो गई है।

किसानों को दीर्घकालीन (सात साल के लिए) अवधि का कर्ज देने वाले एकमात्र राज्य स्तरीय सहकारी बैंक को बंद करने का फैसला सरकार कर चुकी है। इसके साथ ही अधिकारियों-कर्मचारियों के संविलियन की योजना भी लागू की गई थी। इसके तहत राज्य स्तरीय सहकारी संस्थाओं के साथ जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों से रिक्त पदों पर इनका संविलियन किए जाने का प्रस्ताव था। इसके लिए बाकायदा प्रस्ताव भी मांगे गए।

अपेक्स बैंक, मार्कफेड, वनोपज संघ और अंत्यावसायी निगम ने तो 109 कर्मचारियों की सेवाएं ले लीं पर ज्यादातर जिला सहकारी केंद्रीय बैंक पीछे हट गए। राजगढ़ बैंक ने लिखकर दे दिया कि उनकी आर्थिक हालत ऐसी नहीं है कि वे संविलियन कर सकें। इसी तरह सीधी जिला बैंक ने कहा कि रिक्त पद ही नहीं है। गुना बैंक ने भी आर्थिक स्थिति का हवाला दिया और मुरैना बैंक ने साक्षात्कार रख लिया, जिसका कर्मचारियों ने विरोध कर दिया।

सहकारिता विभाग के अधिकारियों ने बताया कि संविलियन करना बंधनकारी नहीं है। सहकारी संस्थाओं से प्रस्ताव मांगे गए थे। जहां से सहमति मिली, वहां संविलियन किया जा चुका है। कुल 446 कर्मचारियों की सेवाएं ही दूसरी संस्थाओं ने ली हैं। योजना की मियाद 30 जून 2017 को समाप्त हो गई है। इसे आगे बढ़ाने का कोई प्रस्ताव भी नहीं है। सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग ने विधानसभा में एक सवाल के जवाब में स्वीकार किया कि राजगढ़ बैंक ने संविलियन से असहमति जताई है। वर्तमान में संविलियन की कोई योजना भी नहीं है।

भवन के किराए से बंट रहा वेतन

राज्य सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक के कर्मचारियों को भवन के किराए से वेतन बंट रहा है। कुछ बैंक किसानों से वसूली करके वेतन बांट रहे हैं। करीब पचास कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल रहा है। दरअसल, सरकार ने जो एकमुश्त समझौता योजना लागू की थी, उसमें प्रावधान रखा गया था कि बैंक जो वसूली करेंगे वो खजाने में जमा कराएंगे और उसमें से एक हिस्सा वेतन के लिए दिया जाएगा। बताया जा रहा है कि योजना असरकारक साबित नहीं हुई। सिर्फ 20 हजार किसानों ने 94 करोड़ 62 लाख रुपए चुकाकर समझौता किया।

317 चपरासी के लिए पद ही नहीं

सूत्रों ने बताया कि 111 कर्मचारी विभागीय या अन्य जांच और शैक्षणिक योग्यता न होने से अपात्र हो गए हैं। 317 चपरासी के लिए किसी भी संस्था में पद नहीं है। यही स्थिति 13 ड्रायवरों के साथ भी है। विभागीय अधिकारियों ने बताया कि अब कर्मचारियों के भविष्य का फैसला बैंक के परिसमापक (बैंक को बंद करने की प्रक्रिया करने वाले) ही करेंगे।

1 हजार 800 करोड़ रुपए बकाया

सहकारिता विभाग के अधिकारियों ने बताया कि 80 हजार से ज्यादा किसानों के ऊपर 1 हजार 800 करोड़ रुपए बकाया है। इसमें 488 करोड़ रुपए मूलधन और 1263 करोड़ रुपए ब्याज है। सरकार इस ब्याज को माफ करने को तैयार थी। इसके लिए किसान को तीन किस्तों में राशि देनी थी पर वे इसके लिए भी तैयार नहीं हुए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *