चुनावी साल में सख्ती से बच रही बीजेपी

जबलुपर नगर प्रतिनिधि। भारतीय जनता पार्टी अनुशासन के मामले में हमेशा से अच्छा चरित्र प्रस्तुत करने वाला दल रहा है। जो उसे विरासत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से मिला है। ऐसा नहीं है कि यहां अनुशासन हीनता नहीं होती। होती तो है पर सगंठन का चाबुक इतना जोर से चलता है कि सबकी हेकड़ी निकल जाती है।

अनुशासन का मामला….
भीतर खाने पड़ रही लताड़, बाहर नहीं जा रहा संदेश

पिछले कुछ दिनों से भाजपा में भी अनुशासन के प्रति ठुलमुल रवैया अपनाया जा रहा है। कार्यकर्ता हो या पदाधिकारी बंद कमरों के विवाद खुल कर सामने आ रहे है। और संगठन उस पर गांधारी बना बैठा है। वे दिन दूर नहीं गए है जब जरा सी न नुकर पर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता था। व्यक्तिवाद से उठ कर खुद को विचारवाद पर लाने वाली पार्टी पिछले एक साल से व्यक्तिगत स्वार्थो और राजनैतिक हितों के लिए विचारधारा से समझौता कर रही है। मनमर्जी कि नियुक्तियां हो, सड़को के विवाद हो या फिर पार्टी के खिलाफ बगावत हो सभी जगह एक खामोशी सी दिखती है। आंतरिक मामला बता कर उठ रहे सवालों को टाला तो जा सकता है, पर बचा नहीं जा सकता। जैसे शुर्तु मुर्ग मिट्टी में सर छुपा कर समझता है कि उसे कोई नहीं देख रहा पर ऐसा होता नहीं है।
इन मामलों में खामोशी
आपराधिक लोगों को बनाया पदाधिकारी
संगठन को किनारे कर के मनमर्जी की नियुक्तियां
विवादित मंडल अध्यक्षों पर नहीं कार्यवाही
पंजा छाप भाजपाईयों का पार्टी में बड़ता दखल
अधिकारियों पर कार्यकर्ता डाल रहे वेजह का दबाव
होटल विवाद पर एक तरफा रूख
जनप्रतिनिधियों और संगठन में समन्वय की कमी
वरिष्ठों को नजरंदाज करना।
इस समय पार्टी फोरम पर कई मामलों की शिकायते लटकी हुई है। लेकिन पार्टी इस पर कोई ठोस निर्णय लेने से बच रही है। चाहे संजय नाहटकर का मामला हो या फिर रज्जू राठौर का या फिर आल्पसंख्यक मोर्चो के कांग्रेसी करण का विषय। सारी जानकारियां नगर संगठन के संज्ञान में है। पार्टी के लोगों ने नामज़द शिकायत भी कि है। बैठकों में बहस भी हुई हैै। पर कार्यवाही कुछ भी नहीं हुई जो भाजपा को कंाग्रेस की कार्यशैली के समकक्ष खड़ा कर रही है।
इसलिए बच रहे-
एक तरह से देखा जाए तो यह चुनावी साल है। २०१८ के आखिरी में चुनाव होना है। ऐसे में पार्टी कार्यवाही से बच रही है। पार्टी का मानना है कि यदि एक पर कार्यवाही की गई तो फिर यह एक चलन सा बन जाएगा। आए दिन कोई-न-कोई शिकायत लेकर खड़ा रहेगा क्योंकि राजनिती में विरोध प्रतिरोध कोई बड़ी बात नहीं है। जिसके चलते चुनावी साल में इस तरह के निर्णयों से बचा जा रहा है। परंतु गंभीर विषयों पर गांधारी की तरह आंखों में पट्टी बांध ली जायेगीं तो फिर दुर्याेधन ही तैयार होगें जो खुद तो इतिश्री को प्राप्त होगें ही साथ में हस्तिनांपुर के बफादार भीष्मपितामह सहित द्रोणाचार्य, कृपाचार्य जैसे निष्ठावान लोगों को भी ले डूबेगें।

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