जीत कर भी गर्व से पहना जाए वो सुंदर हार हूं मैं

हर जगह सिर्फ मैं ही तो हूं। कोई लाख चाहे तो भी मुझसे दूर नहीं। सुख में साथ तो दुख में भी आपके ही साथ रहता हूँ। मेरे जितने रूप हैं उन्हें भले ही लोगों ने अलग-अलग नाम दिये हों पर मेरा एक नाम है जो दुनिया मे कोई नहीं बदल सका। मैं ही हूं आपका प्यारा फूल। मुझ पर लिखीं गईं हैं कई कविताएं, गीत मेरा जिक्र होता है वेद शास्त्रों में, श्रद्धा और आस्था में, सम्मान और श्रधांजलि में। वक्त के अनुसार मेरे रूप से प्रगट हो जातीं हैं अंतर्मन की भावनाएं। बिना बोले ही अल्फाजों को बयां करने मेरा कोई तोड़ नहीं। लोग कुछ भी कहें पर मेरी जुबां न होते हुये भी लोग मेरे ही जरिये पूरी बात कर लेते हैं। परिणामों की खुशी मुझसे अच्छा भला कौन जता सकता है? तभी तो मैं गर्व से कहता हूँ कि जीत कर भी जो गर्व से पहना जाए वही तो सुंदर फूलों का हार हूं मैं। पं. माखनलाल चतुर्वेदी की रचना पुष्प की अभिलाषा को पढ़कर मेरा भी मन द्रवित हो जाता है। मेरी अभिलाषा का यह सटीक चित्रण आज भी प्रासंगिक है। फूल या फिर पुष्प मेरा एक ही नाम ऐसा जिसे लेने में किसी को परहेज नहीं। मैं ही तो हूं जिसे लोग सर्वदलीय कहें तो अतिशयोक्ति नहीं। भले ही चुनावों तक मुझे विवादों में घसीटा जाए पर जीत के बाद तो मैं ही विजेता के गले में इतराता फिरता हूं। जीवित मानव जब मुझे सम्मान से पाने के लिए आतुर दिखता है तो दिवंगत की देह पर भी मैं सुशोभित होकर अंतिम बिदाई के लिए आतुर रहता हूं। मेरी किस्मों में भले ही भिन्नता हो मगर नाम के अनुरूप मैं ही तो लोगों से गुपचुप दिल की बात कहता हूं। मेरे रूप को विविध तरीकों से सुशोभित कर लोग अपने दिल की बात मेरे जरिये व्यक्त कर देते हैं। मैं लोगों की भाषा बन जाता हूं, यही खूबी सिर्फ मुझमें ही है। मेरे आकार रंग और रूप को देख कर लोग आसानी से अंदाजा लगा लेते हैं कि क्या माजरा है। लोगों ने भले ही मेरे आकार और रंग के अनुसार भेद तैयार कर लिए पर मैनें कभी भी लोगों में भेद नहीं किया। जिसने जब चाहा जहां चाहा मुझे चढ़ा दिया। ईश्वर के दर पर मेरी सुगंध मन मोहती है। सम्मान के चरणों में चढ़ मुझे भी खुशी होती है। कितना अजीब है मेरा यह रूप जब मंच पर सम्मानित होते मेरे उपयोग से व्यक्ति की खुशियां चरम पर पहुंच जाती हैं। यदा-कदा खुशी के आंसु भी छलक पड़ते हैं और फिर जब किसी शव पर लिपटा मुझे देखा जाता है तो दुख में भाव-विभोर होते भी देखा जाता है। पुष्प गुच्छ से सम्मान का शब्द अक्सर कार्यक्रमों में गूंजता है, तो वहीं माला पहना कर लोग गदगद भी होते हैं। मैं ही तो हूं जिसे दलगत राजनीति से उपर उठ कर हर कार्यक्रमों में जाने का सौभाग्य मिलता है। मंच पर पहुंचने की लालसा हर किसी के मन में होती है, पर यहां तो सिर्फ मेरा ही अधिकार नजर आता है। कार्यक्रम के आरंभ तक मुझे किसी कोने में बैठा दिया जाता है फिर जैसे ही स्वागत की श्रंखला शुरू होती है। मुझे हाथों में लेने की होड़ सी लग जाती है। कभी खुशी कभी गम मैं तो आपके साथ ही हूं हर दम। क्या मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे या फिर गिरजाघर हर जगह सिर्फ मुझमें है प्रेम का ग्रंथ। निरंतर काल से एक मैं ही हूं अच्छे बुरे वक्त का साथी पर लोगों ने जैसे चाहा मुझे बना दिया मानों एक बाराती। जिसकी दुल्हन की बिदाई तक खूब आवाभागत होती। मेरा हश्र किसी से छिपा नहीं है। किसी को भी कुछ क्षण मैं बेहद अच्छा लगता हूं। कई दफे तो मेरे कारण ही खबरें बन जाया करती हैं, पर स्वागत सम्मान के कुछ देर बाद ही मुझे फेंक दिया जाता है किसी कोने में। फिर भी मैं खुश हूं, दुनिया भले ही हाईटेक युग की अंधी दौड़ में भाग रही है, सोशल मीडिया पर स्वागत सम्मान में समा रही है, पर यहां भी मेरी ही फोटो लगा कर स्वयं का गुणगान कर रही है। दुनिया कितनी भी क्यों न बदल जाए पर मेरी महत्ता कभी कम नहीं होगी। गम हो या खुशी बिन मेरे कुछ भी कम नहीं होगी। यह तो आपकी भावना है आप इसे कभी फूल कहें या फिर कभी भूल मै तो फिर इसी पर कायम हूं कि मैं फूल ही रहूंगा आप चाहे तो इसे भूल बनां दें क्योंकि मैं ही तो हूं तो जीत पर भी हार के रूप में हर विजेता के गले पड़ ही जाता हूं।

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