किस्सा टिकट का : जासूस और खुफिया तंत्र टटोल रहा चुनावी नब्स

जबलपुर, नगर प्रतिनिधि। विधानसभा चुनाव 2018 में अभी लगभग एक साल का समय बचा है लेकिन चुनावी सरगर्मी लगातार बढ़ती जा रही है। सत्ता हो या विपक्ष सभी के दावेदार एक एक करके मैदान में ताल ठोंक रहे हैं। ऐसे में हर कोई जो चुनाव लड़ना चाहता है या चुनाव लड़वाना चाहता है वहजीत हार के समीकरणों को टटोल रहा है। ऐसे में जासूसी करने वाली निजी एजेंसियों सहित सरकारी खुफिया तंत्र का जमकर उपयोग हो रहा है। पार्टियां अपने स्तर पर अपनी जमीन तलाश रही हैं तो सरकार भी हवा के रुख को परखने के लिए अपने तंत्र को मैदान में उतार चुकी है।
कैसा है परफार्ममेंस
यदि जबलपुर की बात की जाए तो यहां आठ विधानसभा क्षेत्रों में से 6 पर भाजपा का कब्जा है और पार्टी इस परफार्ममेंस को कायम रखना चाहती है जिसके लिए जरूरी है कि उसे मामूल हो कि किस विधायक ने अपने क्षेत्र में क्या काम किया है और उसकी छवि कैसी है। इसको परखने के लिए खुफिया तंत्र उनकी रिपोर्ट तैयार करके पार्टी तक पहुंचाने में लगा हुआ है। पार्टी ही क्यों सरकार भी अपनी कमी और खामियां को जानने के लिए इस तंत्र का भरपूर प्रयोग करती है।
चुनावी खर्च भी है वजह
आज के दौर में विधानसभा का चुनाव और टिकट लाना कितना महंगा हो गया है अब उससे हर को वाकिफ है। पार्टी से टिकट लेकर आना और फिर करोड़ों खर्च करने के बाद भी जीत न मिले तो बड़ी क्षति होती है। ऐसे में टिकट के दावेदार अपने स्तर पर जासूसी कराकर अपनी ग्राउण्ड रिपोर्ट जानने में भी काफी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। हर नेता चाहता है कि जीत के समीकरण बनने पर ही चुनावी मैदान में उतरा जाए।
बाहर की एजेंसियां सक्रिय
इन दिनों चुनावी सर्वे और इनवेस्टीकेशन करने में माहिर एजेंसियां शहर में सक्रिय हैं। चुनावों से एक साल पहले इस तरह की सक्रियता 2013 में भी देखने को मिली थी। अब चुनाव पोलिंग बूथ के साथ साथ वार रूम में भी लड़े जाने लगे हैं जिनको लेकर नेता भी अब सक्रिय व सजग रहते हैं। ऐसे में प्रोफेशनली काम करने वाले लोग बड़े नेताओं के कार्यालय में जमे दिख जाते हैं।

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