सिर्फ मृत कर्मचारियों के आश्रितों को पुराने पेंशन का लाभ केन्द्रीय कर्मचारी पेशोपेश में जिंदा रहें कि मर जायें

जबलपुर विशेष प्रतिनिधि। नये पेंशन नियम को रद्द कर पुराने पेंशन नियम को लागू करने के लिए पिछले डेढ़ दशक से की जा रही मांग के चलते केन्द्र सरकार ने उसमें आंशिक संशोधन कर आदेश दिया है कि अब कर्मचारीयों केा स्थाई विकलांगता पर पुराने नियम से पेंशन लाभ की पात्रता होगी। यदि कर्मचारी सेवारत या सेवानिवृति के बाद मृत हो जाता है तो उसके परिवार के आश्रित को पुराने पेंशन नियम के अनुसार पेंशन लाभ की पात्रता होगी।

ऐसे में कर्मचारी दुविधा में और आक्रोशित है कि सरकार उनके 30-35 वर्ष के योगदान को नकार रही हैं। उनको यह सोचने के लिए विवश कर दिया किये क्या अपने परिवार की बेहतरी के लिए अपना जीवन समाप्त कर दें। उल्लेखनीय है कि पुराने पेंशन लियम के तहत सरकारी कर्मचारी को सेवा निवृत्ति के बाद बिना किसी अंशदान जमा किये पेंशन का हकदार होता था।

यदि कर्मचारी की मृत्यु 3 वर्ष सेवा अवधि पूरी करने के बाद किसी कारण हो जाती थी तो परिवार के आश्रित को निर्धारित गणना के बाद मूल पेंशन की 60 फीसदी रकम पेंशन के रूप में मिलने का प्रावधान हैं। डेढ़ दशक पूर्व तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पुराने पेंशन नियमों को समाप्त कर। जनवरी 2004 के बाद भर्ती केन्द्रीय कर्मचारीयों को नये नियम के अंशदान प्रतिमाह अपने वेतन से जमा कराना अनिवार्य हैं। इसके बाद यह भी निश्चित नहीं है कि उसे सेवा निवृत्ति पर कितनी पेंशन मिलेगी। क्योंकि जो जैसा कर्मचारी जमा करेगा वह शेयर मार्केट में लगाया जायेगा।

सेवा निवृत्ति पर उसके अंशदान राशि की शेयर बाजार में क्या स्थिति है, उसके अनुसार लाभांश सेवानिवृत्ति कर्मचारियों को दिया जायेगा। सरकार के उकृ निशोधित पेंशन अधिनियम का सभी संगठन पुरजोर विरोधकर रहे है। डेढ़ दशक बाद सरकार ने इसमें संशोधन कर स्थाई विकलांगता वाले कर्मचारियों और मृत कर्मचारियों को पुराने पेंशन नियम के तहत पेंशन देने का फैसला किया हैं। लेकिन कर्मचारी संगठनों द्वारा अभी भी विरोध किया जा रहा है।

उनका कहना है कि सरकार ने उसकी स्थिति हाथी के समान कर दी है। जिसकी कीमत जिंदा में लाख रूपये की होती है और मरने के बाद उसकी कीमत सवालाख रूपये की हो जाती है। फिलहाल मजदूर संगठन नयी पेंशन नीति को विलोपित करने की मांग को लेकर वर्तमान में भी आंदोलन रत है।

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