दूध से जुड़े राहुल के ‘गुजरात मॉडल’ में भी पिछड़ी कांग्रेस

ओमप्रकाश तिवारी, आनंद। गुजरात विधानसभा चुनाव में विकास के गुजरात मॉडल को लेकर भी कांग्रेस-भाजपा अपने-अपने दावे कर रही है। मंगलवार को अंकलेश्वर की सभा में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जिस पुराने गुजरात मॉडल को लाने का जिक्र किया था, वास्तव में वह मॉडल भी अब कांग्रेस के हाथ से पूरी तरह फिसल चुका है।

राहुल गांधी ने अपनी न्यूजीलैंड यात्रा का जिक्र करते हुए कहा था कि न्यूजीलैंड सारी दुनिया में दूध एवं दुग्ध उत्पाद बेचता है, सिवाय भारत के। क्योंकि यहां अमूल और आनंद हैं। राहुल कांग्रेस के सत्ता में आने पर भाजपा के गुजरात मॉडल के बजाय अमूल-आनंद का गुजरात मॉडल लाने की बात कर रहे थे।

सहकारी संगठनों से कांग्रेस का सफाया हुआ-

पिछले डेढ़ दशक में अमूल और आनंद के गुजरात मॉडल को दुनिया में प्रसिद्धि दिलाने वाले सहकारी संगठनों में न सिर्फ उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, बल्कि इन संगठनों से कांग्रेस का पूरी तरह सफाया भी हो चुका है। गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में दूध का उत्पादन करने वाले 36 लाख से ज्यादा किसानों की 18000 सहकारी संस्थाओं के कर्ताधर्ता भाजपा संगठन से जुड़े हुए हैं।

बड़ी बात यह कि सूरत के हीरा व्यवसाय या दूसरे उद्योगों में मंदी के दौर में अपने गांव लौटने वाले युवाओं को यह व्यवसाय बड़ा सहारा भी दे रहा है।

आनंद स्थित अमूल डेयरी विश्वप्रसिद्ध है-

सहकारिता के मॉडल पर चलने वाली इस डेयरी के संस्थापक त्रिभुवनदास पटेल एवं यहां श्वेत क्रांति के जनक वर्गीज कुरियन के प्रयासों से गुजरात के गांव-गांव में महिलाएं दुग्ध उत्पादन कर अपने गांव में ही एक स्थान पर दूध इकट्ठा करती हैं। फिर अमूल डेयरी की गाड़ी आकर वहां से दूध ले जाती है। यह मॉडल किसानों के लिए पर्यायी आमदनी का एक अच्छा साधन बन चुका है।

इस व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ) का गठन किया गया है। राज्य के 36 लाख किसान परिवार करीब 200 लाख लीटर दूध का रोज उत्पादन कर जीसीएमएमएफ से जुड़ी 18000 सहकारी संस्थाओं के जरिये अमूल डेयरी तक दूध पहुंचाते हैं।

18 हजार से ज्यादा सहकारी संस्थाएं इससे जुड़ीं-

ये संस्थाएं राज्यभर में 18 बड़ी यूनियनों से जुड़ी हैं। पिछले डेढ़ दशक में सहकारिता के आधार पर चलने वाली इन यूनियनों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। 2003-2004 में जहां ग्राम स्तर पर 10,500 सहकारी संस्थाएं सक्रिय थीं, वहीं अब इनकी संख्या बढ़कर 18000 हो गई है। इनके व्यवसाय में भी जबर्दस्त उछाल आया है। 2009 में जीसीएमएमएफ का व्यवसाय जहां 8000 करोड़ था, वहीं 2016-17 में तीन गुने से भी ज्यादा बढ़कर 27000 करोड़ हो गया है।

सहकारी दूध संस्थाओं पर भाजपा का कब्जा-

जाहिर है, सौदा किसानों को सीधा फायदा पहुंचाने वाला है। इसलिए कांग्रेस और भाजपा दोनों इन सहकारी दुग्ध संस्थाओं पर कब्जा करने की कोशिश में रहते हैं। लेकिन, लगातार 22 सालों से सत्ता में रहने के कारण इस क्षेत्र में भी भाजपा भारी पड़ती दिखाई देती है।

भाजपा प्रवक्ता जयनारायण व्यास के अनुसार, इन सहकारी संस्थाओं के जरिये गांवों तक पहुंचने का भाजपा का प्रयास सफल रहा है। फिलहाल सभी 18 यूनियनों के प्रमुख भाजपा के हैं। यही नहीं, जीसीएमएमएफ के चेयरमैन रामसिंह चौहाण 2012 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने थे। लेकिन, पिछले दिनों राज्यसभा चुनाव की उठापटक में वह अब भाजपा के पाले में आ चुके हैं। बात सिर्फ 18 यूनियनों तक सीमित नहीं है।

वोट की बात करें तो यह ग्राम स्तरीय 18000 हजार सहकारी संस्थाओं से जुड़ते हुए घर-घर तक पहुंचती है और ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा इसे अपनी बड़ी ताकत मान रही है।

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