मौसम चुनावी है राहत की बारिश तो होगी ही

इसी बहाने (आशीष शुक्‍ला )। मौसम मानसूनी भले ही देश मे जल प्रलय के हालात पैदा कर रहा हो, लेकिन मौसम चुनावी है तो मानसून से कहीं ज्यादा चर्चा चुनाव की है। जहां बारिश परेशानी का सबब बनी है वहां भी और जहां लोग अब तक मानसूनी फुहार की आस लगाए बैठे हैं वहां भी। प्रदेश ही नहीं देश में भी हालात कुछ ऐसे ही हैं।

वैसे इन स्थानों में भी बयानों की बारिश सियासी तूफान लाने को बेताब नजर आ रही है। यह कोई नई बात नहीं है। अक्सर ऐसा ही होता है। जब-जब सियासी मौसम के बादल मंडराते हैं तब-तब जनता समझ जाती है कि यह चुनावी मौसम है राहत की बारिश तो अवश्य ही होगी। कुछ बूंदे असली हकदारों पर गिरेंगी तो अधिकांश लाभ अपात्र ही उठा ले जाएंगे।

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यही तो इस देश की विडम्बना भी है। चुनावी बादल से उपजी बारिश को जरूर ध्यान है कि सब अपने हंै, कोई दुखी न रहे। तभी तो सबको लग रहा है कि अपनी तो पौ बारह है। यही सोच कर सब खुश हैं। ऐसी खुशी अक्सर ही प्राप्त होती रहतीं हैं। फिर चाहे मौसम चुनावी हो अथवा मानसूनी । जाने भी दो यारों चार दिन तो खुशी में कटेंगे फिर सब कुछ पुराने ढर्रे पर।

जनता कहीं कतार में लगी नजर आएगी तो कहीं भीड़तंत्र में गुमसुदा की तलाश में जुट जाएगी। अभी तक तो सब कुछ ठीक पर आने वाला भविष्य कितना ठीक होगा यह तय नहीं। सभी मानसूनी बारिश और इनसे उपजे मेंढक की भांति राग अलापने में व्यस्त हैं।

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जनता का क्या जनता तो कूप मण्डूक अर्थात कुएं के मेंढक के समान ही है। उसे तो इंतजार यही कि न मालूम कब कुआं छलकेगा और वह कुएं से बाहर निकलेगी। जिसको मिला वह खुश, जिसको नहीं मिला वह उम्मीद में। उम्मीद के सहारे दिन कटना कोई नई बात नहीं।

यह तो इस देश और यहां के लोकतंत्र की वर्षों पुरानी परंपरा का एक रूप है जो कभी सुखद महसूस होता है तो कभी दुखद। चुनावी बयार की यह बारिश राहत की बूंदों के साथ सुंदर सपने सजाने के लिए आतुर है। किसी को जनता के आशीर्वाद की चिंता है तो किसी को 4 साल बाद अविश्वास जताने के लिए विश्वास नजर आ रहा है।

सत्ता उपलब्धियों को लेकर ढिंढोरा पीट रही है तो विपक्ष विफलताओं को बताते फूला नहीं समा रहा।दोनों अपनी-अपनी जगह खुश हैं। ठीक भी है खुशी मिलना चाहिए, चाहे जैसे मिले। इसी बहाने कम से कम थोड़ी बहुत खुशी जनता भी महससू कर पा रही है। योजनाओं के लाभ से उसे भी चुनावी झुनझुना मिल रहा है। अक्सर पांच वर्ष पूरे होने के पहले ऐसा ही कुछ होता है।

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आम जन अपनी खुशियों की खातिर सब कुछ लुटाने के लिए तैयार हैं। उसे भी इंतजार है कि वक्त चाहे जैसा गुजरा आने वाला समय तो सौगातों के पिटारे से उसके लिए कुछ न कुछ जरूर ही लेकर आएगा। जनता की यही उम्मीद तो उसे सुख और शांति प्रदान करती है। सब ऐसे ही खुश रहें हमारी भी सदैव यही दुआ रहती है।

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