दांव पेंच ने महंगाई से पूछा डायन के साथ तुम्हारा नाम क्यूं?? 

इसी बहाने (आशीष शुक्‍ला)। कुछ वर्ष पहले महंगाई डायन खाय जात है गाना काफी हिट हुआ था हो भी आखिर क्यों न डायन तो वैसे भी एक काल्पनिक वो करेक्टर है जिसे बुराई के रूप में हमेशा ही याद किया जाता रहा है। आज इस बैड करेक्टर को मंहगाई के साथ जोड़ दिया गया तो यह जनभावनाओं के एकदम करीब पहुंचना सही था।
आज हर शख्स मंहगाई रूपी डायन से रोज ही दो चार हो रहा है। इधर जब महंगाई रूपी डायन आम जन को परेशान करने में लगी है तो इस दौरान दांव पेंच भी लगनशील भाईयों की तरह साथ साथ अपने काम मे जुटे हैं। डायन की तुलना मंहगाई के साथ या फिर मंहगाई की तुलना डायन के साथ बात तो वही है केवल दांव पेंच का खेल है कब किसकी तुलना कहां सटीक ढंग से हो जाये।
यह तो दांव पेंच का समय ही है जब चाहे अपने को निखार ले। जनता को उलझा दे। किसी को शह और मात दे दे तो किसी को बाजी ड्रा रखने पर मजबूर कर दे। आज सुबह जब घर से निकला तो मन मे मंहगाई और डायन की तुलना कर रहा था न तो यह समझ मे आ रहा था कि डायन आखिर कितना खराब करेक्टर था जो आज की 21 वीं सदी में हिट है।
मंहगाई के साथ इसकी तुलना में समानता और असमानता का भेद की खोज अभी भी जारी है परिणाम की प्रत्याशा में सफलता कब मिलेगी पता नहीं लेकिन इस बीच दांव का यह परंपरागत खेल तो जारी ही है। दांव पेंच पर भी मेरा मन काफी बावला होता रहता है। हर वक्त मन में हमेशा ही सवाल कौंधता रहता कि इन दो अनजान किन्तु महान शख्सों का जन्म कब हुआ इनके जन्मदाता कौन हैं कब कब ये लोग सामने आते हैं और कब नेपथ्य में चले जाते हैं।
सवालों की दुंदुभी के बीच मन मे   प्रश्न बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तरह नाच रहे थे। दांव पेंच विषय पर ज्ञान बाटने वाले इसकी नई नई परिभाषा को बता बता कर दिमाग की दही कर रहे थे भटकाव के बीच मेरे मन का निचोड़ राजनीति और खास तौर पर चुनावी संक्रमण काल की तरफ चला गया सारे उत्तर सामने खड़े थे। जवाब आ कर मानों विनती कर रहे थे कि है तुच्छ प्राणी मुझे महसूस करो मैं तो हर पल तुम्हारे ही सामने खड़ा हूँ। तुम ही हो मुझे समझ नहीं पा रहे।
अब तक मैं समझ ही चुका था कि दांव और पेंच नामक इन महानुभावों का जन्म निः सन्देह हमारी राजनीति के द्वारा ही हुआ है जिसमे कभी दांव भारी पड़ता है कभी पेंच बाजी मार लेता है। हम क्या हर आम भी इनके फेर में पड़ ही जाता है । महसूस तो यह भी हुआ कि मंहगाई की डायन या फिर डायन की मंहगाई से तुलना भी दांव पेंच की ही देन है ।
देश में जब जब लोकतंत्र का उत्सव शुरू होता है इसी से जन्मे दांव और पेंच जी भर कर अपनी चाल चलते हैं । जनता या यूं कहें मतदाता कभी इस दांव पेंच में फंस कर कम से कम पांच साल तो खुद को ठगा सा महसूस करते हैं तो कभी इन्ही दांव पेंच में की उलझन को समझ कर भली भांति पहचान कर इस पर अपना दांव खेल लेते हैं और तब दांव पेंच पर जनता का दांव भारी पड़ जाता है। बहरहाल अब आने वाला समय काफी संवेदनशील है जहां रोज ही नए नए दांव पेंच चलते रहेंगे कभी कोई इसमे फंसा नजर आएगा तो कभी दांव उलटे ही पड़ते नजर आएंगे।
वक्त है पता नहीं कब किसके दांव को उल्टा कर दे और कब किसके दांव में फंस जाए। दांव पेंच में जुबानी ताकत काफी महत्वपूर्ण होती है तभी तो रोज नए जुबानी तीर निकलते हैं ये और बात है कि फिर कभी यह निशाने पर फिट बैठ जाते हैं तो कभी वापस आकर खुद को ही घायल कर देते हैं। दांव पेंच से बचने के लिए बचाव के सुरक्षा चक्र में अहम भूमिका निभाता सोशल मीडिया इन दिनों अपनी महती भूमिका निभाता है। मीडिया की भूमिका भी कम नहीं अब तो दांव पेंच की ही भांति मीडिया के भी दो भाई हो गए एक मीडिया और दूसरा सोशल मीडिया। राजनीतिक दांव पेंच सत्ता की कुर्सी पर काबिज होने अपनी सीमाओं को भी लांघने में देर नहीं करता। फिर चाहे इसके दुष्प्रभाव ही क्यों न सामने आएं।
सत्ता हितों की खातिर दांव पेंच की मर्यादा भी तार तार हो जाती है। खैर अभी तो हालत यह हैं कि दांव पेंच भी पूछ रहे हैं आखिर यह डायन के साथ महंगाई कहां से आ गई आपत्ति तो डायन को भी जबरदस्त है कि आखिर उसका नाम महंगाई के साथ लेकर उसे बदनाम क्यों किया जा रहा है क्योंकि कहा जाता है डायन भी एक घर छोड़ कर चलती है लेकिन मंहगाई तो किसी भी घर को नहीं बख़्सती। गौर करने वाली बात है कि मंहगाई डायन कभी कांग्रेस को भाती है कभी सततापक्ष  को अच्छी लगने लगती है।
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