पावर पालिटिक्स : पावर पालिटिक्स, पावर पालिटिक्स……

इसी बहाने (आशीष शुक्‍ला )। पावर पालिटिक्स का यह नया दौर देश को न जाने किस दिशा में ले जा रहा यहां संख्याबल के आगे सब कुछ बौना हो गया है। न तो राजनीतिक दलों की कोई विचारधारा बची, न ही इनका मूल सिद्धांत। अब तो केवल और केवल सत्ता ही नजर आ रही है। सत्ता की खातिर कोई कुछ भी करने को तैयार है।

फिर चाहे वह गठबंधन की राजनीति हो या फिर धर्म का सहारा। जातियों में भेद हो अथवा भड़काऊ टिप्पणियां। बात तो सभी सवा सौ करोड़ देशवासियों की बड़े गर्व से कर रहे, मगर देश क्या चाह रहा उसकी फिक्र किसी को नहीं। चुनाव तो इस देश में आजादी के बाद से ही लड़े जा रहे, विजय और पराजय भी हर आम और खास देखता आ रहा, किन्तु इस सब मे तब देश हित ही सर्वोपरि हुआ करता था। आज न तो देश हित दिख रहा न ही समाज हित दिख रहा है तो केवल सत्ता हित या फिर व्यक्ति हित।

शुचिता की बात बेमानी सी हो गई, जब चाहे विचारधारा बदल लो, जब चाहे दुश्मन के साथ मिल बैठो। कार्यकर्ता भी रोज ठगे जा रहे, मन ही मन स्वयं की उपयोगिता समझ नहीं पा रहे। कर्मठ कार्यकर्ता पेड वर्कर के आगे बौने हो चले। राजनीति की दिशा बदली तो देश की दशा भी बदल गई। लोकतंत्र की परिभाषा का दलों के दल-दल अपने अपने हिसाब से परिभाषा फिट करने की जुगत लग गये। संविधान के नियमों की व्याख्या भी हितों को देख कर हो जाती है।

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मूल उद्देश्य से भटके राजनीतिक दल जनता के लिए चाहे जो कहने और करने का दावा करें किन्तु जैसे ही बात उनके दल तक पहुंचती है वह स्वयं को जनता से अलग करने में देर नहीं करते। पूंजीवादी व्यवस्था का बोलबाला सिर चढ़कर बोल रहा है। शुचिता और सिद्धांत की बलि देवी पर रोज ही जनता की आकांक्षाओं पर चढ़ रही हैं। सत्ता साधने के लिए नित नए जुमलों की भरमार है, तो वहीं कहीं दुष्कृत पर राजनीति हो रही है तो कहीं किसान के नाम पर आंसू बहाए जा रहे हैं।

एक अदद सत्ता की कुर्सी में अलग अलग पाया भी फिट करने की होड़ चलने लगी है। यूं तो हर पांच साल में इससे पहले भी माहौल कुछ ऐसा ही नजर आता रहा, लेकिन तब भी विचारधारा का परित्याग करने से अच्छा सत्ता का स्वार्थ छोड़ना भी लोगों ने देखा है। आज तो सत्ता की खातिर विचारधारा क्या व्यक्ति खुद को भी दूसरे हाथों में बेचने की बोली लगाने को तैयार है। सत्ता बदलते विचारधारा फिर बदल जाये तो किसी को जरा भी आश्चर्य नहीं क्योंकि यहां तो अपवित्र गठबंधन चाहे जहां दिखने लगा है।

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पहली बार ही दिखा जब सत्ता में शामिल दल बाहर खूब कोस रहे हैं फिर भी सत्ता का मोह उन्हें सत्ता के साथ रहने को पता नहीं क्यों मजबूर कर रहा है। हालांकि यह पब्लिक है सब जानती है सत्ता के पहले के गठबंधन को भी और सत्ता के बाद के गठबंधन को भी। परिणाम सुनने के लिए बेताबी नहीं फिलहाल तो परिणाम सुनाने की बेताबी झलक रही है। सत्ता के केंद्र बिंदु की वरिष्ठता कनिष्ठता में बदल गई। जानकर व्यक्ति कुछ भी कहने को तैयार नहीं, वह भी चुपचाप सब निहार रहा है। बात सिर्फ एक, जो जैसा करेगा वैसा भरेगा। फिर चाहे सत्ता हो या विपक्ष। सौ की सीधी एक बात, दल कोई हो चुनाव के वक्त वह दलदल ही बन जाते है।

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न तो उसकी कोई विचारधारा रह जाती है न ही सिद्धान्त। अब देखना यह है कि सिद्धांतो को त्यागने वालों को जनता त्यागती है या फिर संख्याबल के आगे जनादेश बौना हो जाएगा। अब तक सुना जाता था कि राजनीतिक में न तो कोई स्थायी दोस्त होता है न ही दुश्मन, पर इसे देखा नहीं था। आज वह साकार होते आसानी से नजर आ रहा है। कहीं दुश्मन गले मिल रहे हैं तो कहीं दोस्त कट्टर दुश्मन बन गए हैं। क्या वाकई सत्ता ऐसी चीज है जो हर असंभव को संभव बना सकती है? कभी सिर्फ बड़े बुजुर्गों के मुंह से सुना था, आज वह प्रत्यक्ष देख भी लिया। खैर अब कुछ वक्त ही बचा है ऐसे न जाने कितने बंधन टूटेंगे और न जाने कितने गठबंधनों के किले ध्वस्त हो जाएंगे। परिणाम जिसके अनुकूल हुआ वह खुशी-खुशी लोकतंत्र को सराहेगा और जिसके प्रतिकूल गया वो कहीं वोट प्रतिशत को झांकेगा तो कहीं बेचारी ईवीएम को पानी पी-पी कर कोसेगा।

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