हाथ बदल गए लड्डू वही हैं….

इसी बहाने (अशीष शुक्‍ला ) । राजनीतिक अंगड़ाई कब किस ओर ले ले कुछ नहीं कहा जा सकता। यही वो जगह है जहां लड्डू वही होते हैं केवल हाथ ही बदल जाते हैं। राजनीति का तकाजा यही है, कब किसके हाथ में लड्डू आ जाये कुछ नहीं कहा जा सकता। पिछले दो दिनों में सत्ता के लड्डू के हाथ कुछ यूं बदले कि यह देश-प्रदेश की सुर्खियां बन गया। कुछ के मन मे निराशा के लड्डू फूटे तो कई ने खुशी के लड्डू खूब खाये।

राजनीतिक बिसात पर चुनावी लड्डूओं के हाथ बदलने का क्रम फिलहाल यूं ही अगले 6 माह तक जनता विशेष तौर पर मतदाता देखता रहेगा। लड्डू थामे नए हाथ वाले खेमे के मन में तो फ़िलहाल लड्डू फूटना ही लाजमी है। ये और बात है की लड्डूओं के साथ मिले कांटों भरे ताज पर समर्थकों का जरा भी ध्यान नहीं। ऐन चुनाव से ठीक पहले सत्ता के संगठन में इस बड़ी सर्जरी के कई मायने निकाले जाना भी जरूरी हैं। भले ही समर्थक या विरोधी इसे अपने-अपने नजरिये से देखें पर हकीकत तो यही है कि जितने बड़े यह लड्डू उतनी ही बड़ी इसे संभालने की जिम्मेदारी। वरना सभी जानते हैं मोतीचूर के लड्डू के मोती बिखरने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। खैर जो भी हो इन लड्डूओं ने फिलहाल महाकोशल और विशेष तौर पर संस्कारधानी को तो सुर्खियों में ला ही दिया।

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अब यह कहने में तनिक भी संदेह नहीं कि यही वो जगह है जहां नेतृत्व का टोटा नहीं है। प्रदेश में चल रहे चुनावी साल में अभी बहुत कुछ देखना बाकी है। टिकिट की दौड़ में जीतने हारने वालों के कोपभाजन का शिकार भी लड्डू वाले यही हाथ होंगे। नाराज कार्यकर्ताओं को मनाना-पुटियाना भी किसी परीक्षा से कम नहीं होगा।

बेहद सोच समझ कर लिए गए फैसले पर उम्मीद की कसौटी काफी कठिन है, क्योंकि जिसे मन के लड्डू नहीं मिलते वह मन की बात में इन्हें खराब बताने में जरा भी देर नहीं करता। समय संक्रमण का है, संक्रमण के इस काल मे स्वयं को संक्रमित न होने देना किसी परीक्षा से कम नहीं होगा।

अब सब कुछ वक्त पर निर्भर है। लड्डू वही हैं इन्हें उठाने वाले हाथ ही बदल गए। यह राजनीति में कोई आश्चर्यजनक बदलाव नहीं। ऐसा तो अक्सर ही होता रहता है। दायित्व बदल जाते हैं भूमिका वही रहती है। सभी के कार्य करने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, किंतु इनके उद्देश्य कभी जुदा नहीं होते। आज सत्ता ने अपने संगठन सारथी को बदला है, कल कोई और बदल जायेगा। बदलता सो सिर्फ मतदाता नहीं है और जब मतदाता बदलाव करने पर उतारू हो जाता है तो अर्श से फर्श पर आने में देर नहीं लगती। बहरहाल चुनौतियों के इस काल मे सरलता मिलने की आशा छोड़ ही दी जाए तो बेहतर है। दरअसल वक्त अग्नि परीक्षा का तो शुरू होता है अब। देखना यह है कि बदलाव की इस भूमिका को कर्मठ कार्यकर्ताओं का कितना साथ मिलता है। सभी को अपना फैसला लेने का पूर्ण अधिकार है, अलबत्ता लिए गए फैसले का परिणाम भविष्य के गर्भ में ही छिपा है।

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राजनीतिक दलों में लोग आते हैं, नेतृत्व करते हैं, संगठन को सिरमौर बनाने की जद्दोजहद में जुटे होते हैं परिणाम जब तक पक्ष में आते रहते हैं तब तक जयकारे लगते रहते हैं। अपेक्षाएं इतनी अनंत हो जातीं हैं कि फिर अपेक्षा से जरा सा भी भटकाव हाथों के लड्डू अपने हाथ से किसी दूसरे हाथ मे पहुंचाने में देर नहीं लगती। मेहनत का फल जरूर ही मिलता है। संघर्ष की कामयाबी उत्साह को दो गुना कर देती है,

किंतु यही उत्साह सम्मान को जाने में भी ज्यादा देर नहीं लगाती, तभी तो कहा जाता है कामयाबी पाना आसान है इसे सम्भाल कर रखना बेहद कठिन है। खैर आने वाले वक्त में महाकोशल या फिर संस्कारधानी इस लड्डू की राजनीति का केंद्र बिंदु बनी रहेगी। सत्ता या फिर विपक्ष सभी के लिए देश के भौगोलिक केंद्र बिंदु में राजनीति का केंद्र बने इस शहर ने हर मामले में देश में सुर्खियां बटोरीं हैं।

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दौर लगता है फिर से वही आ गया? क्योंकि कहा भी जाता है इतिहास अपने आप को जरूर दोहराता है। आज फिर देश की मीडिया से लेकर लोगों की जुबां पर संस्कारधानी छाई हुई है । आने वाले वक्त में यह राजनीति का केंद्र बिंदु बनेगा । हाथ मे लड्डूओं की भरमार होगी। संभालने की परीक्षा कठिन होगी, लेकिन यह सब तो राजनीति का एक हिस्सा ही है तभी तो कहा गया है जिसे समझ मे न आये उसे ही राजनीति कहते हैं।

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