…वरना काजल की इस कोठरी में दाग लगते देर नहीं लगती

इसी बहाने (आशीष शुक्‍ला) । यूं तो शोहरत सभी चाहते हैं, बल्कि यह कहना भी जायज की दौलत से ज्यादा शोहरत पाने वालों की संख्या ज्यादा है, पर यह शोहरत भी कभी कभी मुसीबत का सबब बन जाती है, यह भी अक्सर देखने मिलता है, क्योंकि शोहरत हासिल करना जितना मुश्किल उससे भी ज्यादा मुश्किल है इसे संभाल कर रखना।

शोहरत, इज्जत, सम्मान काजल की उस कोठरी के समान हैं जिसमे रहने वाला दाग से बच जाए असंभव तो नहीं पर बेहद मुश्किल है। बहरहाल यह दौर शोहरत वालों के लिये के लिये ज्यादार कठिन है। इज्जत को संभालना एक कठिन जिम्मेदारी का रूप लेती जा रही है। इस रूप को नजर न लगे इसका ख्याल हर शोहरत वाले इंसान रखना चाहिए।

व्यक्ति के लिए छोटी सी शोहरत पाना बेहद कठिन होती है, लिहाजा इस छोटी सी शोहरत पर तोहमत लगाने वाले भी उतनी ही सक्रियता हर उस घड़ी का इंतजार करते रहते हैं। इस घड़ी को लपकने विरोधियों की लंबी फेहरिश्त आनन फानन खड़ी हो जाती है। फिर इससे निपटना बेहद कठिन होता है। बहरहाल सवाल पहले तो शोहरत हासिल करने का फिर उसे इस कठिन दौर में बरकरार रखने का। दौलत तो किसी भी अच्छे या फिर बुरे रूप में कमाई जा सकती है

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पर इस दौलत के साथ शोहरत भी हासिल हो यह जरूरी है, लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि सिर्फ दौलत के कारण ही शोहरत हो। क्योंकि शोहरत का तो कोई मोल ही नहीं होता, यह बे-मोल है और जिसने इसी तरह इसे हासिल किया असली पहचान वही होती है।

समाज मे ऐसा कोई नहीं जिसे शोहरत नहीं चाहिये, किन्तु यह दौलत की कसौटी से हासिल न हो तब। आज के संकीर्ण काल और मीडिया विशेष तौर पर सोशल मीडिया की तीसरी आंख से कुछ भी बच पाना नामुमकिन ही है। जिम्मेदारी मीडिया की भी है कि वह शोहरत वाले व्यक्ति पर लगते आरोपों की सत्यता परखे। आरोप लगाना देश के संविधान की स्वतंत्रता है,

लेकिन इस स्वतंत्रता की कीमत किसी बेगुनाह को सिर्फ इसलिये न भुगतनी पड़े क्योंकि उसके पास किसी भी क्षेत्र में शोहरत हासिल हो। किसी भी क्षेत्र में शोहरत हासिल करने वाले पर तीसरी नजर कुछ ज्यादा ही मेहरबान प्रतीत होती है। आम और खास में फर्क इतना बढ़ जाता है कि कुछ लोगों को सिर्फ खास होने की कीमत शोहरत गंवा कर उठानी पड़ती है। अब यह समय कठिन दौर से गुजर रहा है।

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आसान आरोप और आरोप की सत्यता परखे बिना केवल सनसनी की खातिर हर कोई अपने आप को सक्रिय करने या यूं कहा जाए सक्रिय बताने में जुटा है। अपने साथ चलने वाला भी अपनी शोहरत से ईर्ष्या रखने लगा है। कहीं न कहीं इज्जत पाने वाले व्यक्ति के साथ होने वाला भी यह सोचने पर विवस है कि जब उसे यह शोहरत मिल सकती है तो मुझे क्यों नहीं? शायद यही अतिमहत्वाकांक्षा ही शोहरत पर तोहमत मढ़ने में जरा भी देर नहीं लगाती। तो लब्बोलुआब यही की शोहरत हासिल करें, खूब करें पर उसे संभाल कर रख पाने की क्षमता भी उतनी ही विकसित रखें वरना काजल की इस कोठरी में दाग लगते देर नहीं लगती। वर्तमान समय राजनीतिक शोहरत का कुछ ज्यादा ही नजर आ रहा है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि यही एक जगह ऐसी दिखती है जहां लगता है

आसानी से शोहरत कमाई जा सकती है। पर यही वो जगह भी होती है जहां कुछ ही पलों में शोहरत गंवाई भी जा सकती है। भले ही दूसरों के घर शीशे के हों और वह भी पत्थर उठाने में जरा भी देर नहीं करते, आरोप लगते ही इस आरोप पर मीडिया ट्रायल इस कदर छा जाता है कि चन्द ही पलों में भगवान शैतान नजर आने लगता है। अपने ही कानाफूसी करने लगते हैं।

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हर कोई शक की दृष्टि से निहारने लगता है। सफाई देना भी शंका की दृष्टि में शामिल प्रतीत होता है। लाख अच्छाईयां चन्द बुराइयों के आगे नतमस्तक सी प्रतीत होने लगतीं हैं। एक नहीं ऐसे अनेकों उदाहरण है जिसमे शोहरत को कुछ ही पलों में तोहमत से बर्बाद होते देखा गया है। समय कठिन कम संवेदनशील अधिक है, जहां हर शोहरत को पाने के लिए भी संघर्ष चल रहा है तो उसे गंवाने में महज एक आरोप ही काफी नजर आ रहा है। बावजूद इसके कि पहला पत्थर वो उठाये जिसने कभी पाप न किया हो, हर हाथ मे तोहमत के पत्थर नजर आ रहे हैं।

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